पुनर्जीवन न्यूरोथेरेपी : प्राकृतिक उपचार की ओर बढ़ता एक नया कदम
पंचकूला। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भले ही आज कई जटिल रोगों का इलाज ढूंढ लिया हो, लेकिन फिर भी बढ़ती दवाइयों की खुराक और ऑपरेशन की बढ़ती संख्या ने आम आदमी को चिंता में डाल दिया है। ऐसे समय में यदि कोई उपचार प्रणाली बिना दवा, बिना ऑपरेशन और बिना किसी दुष्प्रभाव के रोगों को ठीक करने का दावा करे तो यह लोगों के लिए आशा की नई किरण साबित हो सकती है। ठीक यही काम कर रही हैं न्यूरोथेरेपिस्ट एवं योग एक्सपर्ट मीना कुमारी बांगड़, जिन्होंने अपने गुरु लाजपत राय मेहरा से सीखी “पुनर्जीवन न्यूरोथेरेपी” को समाज के सामने प्रस्तुत कर एक नई दिशा दी है।
शरीर से ही बनती है औषधि
मीना कुमारी बांगड़ बताती हैं कि पुनर्जीवन न्यूरोथेरेपी में किसी बाहरी दवा या रसायन की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस उपचार पद्धति के अंतर्गत शरीर के विशिष्ट बिंदुओं को सक्रिय कर ऐसी स्थिति उत्पन्न की जाती है कि शरीर स्वयं अपनी दवा खुद बनाने लगता है। यह विधि आंतरिक अंगों की कार्यप्रणाली को सुधारती है और धीरे-धीरे शरीर अपने रोगों को प्राकृतिक रूप से ठीक करने लगता है।
पंचकूला में पहली शाखा का शुभारंभ
रोहतक में एक दशक से सफलतापूर्वक चल रहे पुनर्जीवन न्यूरोथेरेपी एवं वेलनेस सेंटर की पहली शाखा अब पंचकूला में खोली गई है। इस शाखा का उद्घाटन जेवेलर्स एसोसिएशन, चंडीगढ़ के अध्यक्ष एवं दुखभंजन वेलफेयर एंड चैरिटेबल ट्रस्ट के वाइस चेयरमैन महेन्द्र सिंह बरेटा, समाजसेवी डॉ. अमर नाथ गर्ग और डॉ. एसएस काहलों ने संयुक्त रूप से किया।
उद्घाटन अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि केवल लक्षणों को दबाने से रोग जड़ से समाप्त नहीं होता। जब बीमारी की जड़ को समझकर उसका उपचार किया जाता है तभी रोगी को वास्तविक लाभ मिलता है।
एक दशक की यात्रा और हजारों लाभान्वित रोगी
मीना कुमारी बांगड़ ने लगभग दस वर्ष पहले रोहतक में इस केंद्र की स्थापना की थी। तब से लेकर अब तक हजारों रोगी इस पद्धति से लाभान्वित हो चुके हैं। यह उपचार न केवल पारदर्शी और सस्ता है, बल्कि इसमें नैतिकता का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। रोगियों को इससे हो रहे व्यापक लाभ को देखते हुए अब इस उपचार पद्धति के प्रसार के लिए नए केंद्र खोले जा रहे हैं, जिनमें पंचकूला की यह शाखा पहला कदम है।
कौन-कौन से रोग होते हैं ठीक?
पुनर्जीवन न्यूरोथेरेपी सामान्य से लेकर गंभीर रोगों तक के इलाज में कारगर सिद्ध हो रही है। मीना कुमारी बांगड़ के अनुसार, इस पद्धति से कई सामान्य रोग जैसे –
लकवा
सेरेब्रल पाल्सी
माइग्रेन व सिरदर्द
साइटिका, सर्वाइकल व कमर दर्द
डायबिटीज
थायरॉइड
हाई ब्लड प्रेशर
गैस, कब्ज, एसिडिटी जैसी पाचन समस्याएँ
जोड़ दर्द, हार्मोन असंतुलन, थकान
सफलतापूर्वक ठीक किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ जटिल और दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल विकार जैसे –
ग्लूकोमा (काला मोतिया)
भेंगापन
रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा
फेशियल पैरालिसिस
नर्व की कमजोरी
मिर्गी
आदि भी इस पद्धति से सुधार की ओर बढ़ रहे हैं।
इलाज की अवधि
हर रोगी की शारीरिक अवस्था अलग होती है, इसलिए इलाज की अवधि भी अलग-अलग होती है। लेकिन अधिकांश मामलों में केवल 7 से 15 दिनों के भीतर ही रोगी को सुधार महसूस होने लगता है। यही वजह है कि लोग इस प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।
प्रशिक्षण और करियर निर्माण का अवसर
मीना कुमारी बांगड़ न केवल रोगियों का इलाज कर रही हैं, बल्कि वे नए हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स को भी इस पद्धति में प्रशिक्षित कर रही हैं। उनके द्वारा चलाया गया निःशुल्क इंटर्नशिप प्रोग्राम युवाओं को वास्तविक केसों पर काम करने का मौका देता है। प्रशिक्षण के बाद सेंटर की ओर से प्रमाणपत्र भी प्रदान किया जाता है, जिससे उन्हें चिकित्सा क्षेत्र में सेवा और करियर निर्माण दोनों के अवसर प्राप्त होते हैं।
इस तरह यह पद्धति केवल उपचार तक सीमित न रहकर रोजगार और सामाजिक सेवा का माध्यम भी बन रही है।
डिजिटल माध्यम से भी उपचार
आज के डिजिटल युग में मीना कुमारी बांगड़ ने इस पद्धति को ऑनलाइन भी उपलब्ध करा दिया है। देश-विदेश से आने वाले रोगी उनसे ऑनलाइन परामर्श प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा पुनर्जीवन न्यूरोथेरेपी और वेलनेस सेंटर की मौजूदगी यूट्यूब व अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी है, जहाँ लोग निःशुल्क जानकारी ले सकते हैं।
विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय
यदि इस चिकित्सा प्रणाली की गहराई में जाएं तो यह केवल उपचार ही नहीं, बल्कि विज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत समन्वय भी है। यहाँ शरीर की अंतःस्रावी ग्रंथियों को सक्रिय किया जाता है, जिससे शरीर के भीतर की ऊर्जा संतुलित हो जाती है। यह अवधारणा योग और प्राचीन भारतीय चिकित्सा विज्ञान से भी जुड़ी है, जहाँ मानव शरीर को स्वयं में एक संपूर्ण औषधालय माना गया है।
समाज की सेवा और जन-जन तक संदेश
मीना कुमारी बांगड़ का कहना है कि उनका लक्ष्य केवल रोगों का इलाज करना नहीं, बल्कि प्राकृतिक उपचार को जन-जन तक पहुँचाना है। उनका मानना है कि जब समाज दवाइयों पर निर्भरता कम करेगा और प्राकृतिक जीवनशैली अपनाएगा, तभी स्वस्थ और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण होगा।
विशेष अतिथियों की उपस्थिति
इस अवसर पर भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान संस्था के अध्यक्ष अनूप सरीन, समाजसेविका शकुंतला रानी, वरिष्ठ पत्रकार केवल भारती एवं जितेंद्र पाल सिंह सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सभी ने इस नई पहल को समाज के लिए आशाजनक बताते हुए मीना कुमारी बांगड़ को शुभकामनाएँ दीं है .
पुनर्जीवन न्यूरोथेरेपी केवल एक चिकित्सा पद्धति ही नहीं, बल्कि यह एक सोच है – शरीर को आत्मनिर्भर बनाकर रोगों से लड़ने की। यह पहल आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में एक पूरक उपचार के रूप में सामने आ रही है। पंचकूला में नई शाखा के शुभारंभ के साथ अब यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में यह चिकित्सा प्रणाली न केवल भारत, बल्कि विश्वभर में अपनी पहचान बनाएगी और लाखों रोगियों के लिए जीवनदायिनी सिद्ध होगी।

