इस बार उत्तराखंड की घाटियों से लेकर पंजाब और हरियाणा के खेतों तक, और जम्मू-कश्मीर की वादियों तक बाढ़ का पानी लोगों की ज़िंदगी को अस्त-व्यस्त कर चुका है।
रिपोर्ट : सुनीता शर्मा
हर साल मानसून के मौसम में जब बादल पहाड़ों पर बरसते हैं और नदियाँ अपने किनारे तोड़कर मैदानों की ओर दौड़ पड़ती हैं, तब यह दृश्य केवल प्राकृतिक सौंदर्य का नहीं बल्कि एक बड़ी त्रासदी का भी संकेत बन जाता है। इस बार उत्तराखंड की घाटियों से लेकर पंजाब और हरियाणा के खेतों तक, और जम्मू-कश्मीर की वादियों तक बाढ़ का पानी लोगों की ज़िंदगी को अस्त-व्यस्त कर चुका है। घर बह गए, खेत डूब गए, सड़कें कट गईं और हजारों लोग राहत शिविरों में पनाह लेने को मजबूर हो गए। लेकिन बाढ़ की सबसे बड़ी मार सिर्फ घर और फसल खोने तक सीमित नहीं रहती। असली संकट तब शुरू होता है जब पानी उतरता है और अपने पीछे कीचड़, गाद और संक्रमण छोड़ जाता है। यह वह समय होता है जब बीमारियाँ बाढ़ से भी ज़्यादा खतरनाक रूप में सामने आती हैं और समाज को महामारी की ओर धकेल देती हैं।
बाढ़ और बीमारियों का रिश्ता पुराना है। जब पानी अपने प्राकृतिक रास्ते को छोड़कर घरों, गलियों और खेतों में भर जाता है, तो स्वच्छता की पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। सीवर और नालियों का गंदा पानी पीने योग्य जल स्रोतों में घुस जाता है। लोग मजबूरी में वही पानी पीने लगते हैं और फिर हैजा, टाइफाइड, डायरिया और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियाँ फैलने लगती हैं। जहाँ पानी ठहरता है वहाँ मच्छरों का जन्म होता है और फिर डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियाँ आम हो जाती हैं। लंबे समय तक गीले कपड़ों और कीचड़ में रहने से त्वचा रोग बढ़ जाते हैं और गंदगी तथा सीलन से सांस संबंधी बीमारियाँ भी फैलती हैं। इतना ही नहीं, जिन परिवारों ने अपना सब कुछ खो दिया हो, उनके लिए मानसिक स्वास्थ्य भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है। तनाव, अवसाद और भविष्य को लेकर चिंता इन आपदाओं का अदृश्य लेकिन गंभीर परिणाम है।
उत्तराखंड की स्थिति सबसे जटिल कही जा सकती है। पहाड़ी इलाकों में बाढ़ के साथ-साथ भूस्खलन और सड़कों का टूटना सामान्य है। एक गाँव से दूसरे गाँव का संपर्क टूट जाता है और स्वास्थ्य सेवाएँ समय पर वहाँ नहीं पहुँच पातीं। छोटे-छोटे स्वास्थ्य केंद्रों में दवाओं का अभाव हो जाता है और डॉक्टरों की कमी सामने आ जाती है। ऐसे समय में हेलीकॉप्टर या मोबाइल स्वास्थ्य वैन ही एकमात्र सहारा बन पाती हैं। सरकार को चाहिए कि पहाड़ी इलाकों में तुरंत अस्थायी स्वास्थ्य शिविर स्थापित करे और लोगों को क्लोरीन टैबलेट तथा पानी फिल्टर उपलब्ध कराए ताकि दूषित पानी से होने वाली बीमारियों को रोका जा सके।
पंजाब में बाढ़ का असर अलग तरह से दिखाई देता है। यहाँ के खेत पानी में डूब जाते हैं और हरी-भरी फसलें खराब हो जाती हैं। जब फसलें सड़ने लगती हैं तो संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। राहत शिविरों में भीड़-भाड़ और अस्वच्छता के कारण दस्त और उल्टी जैसी बीमारियाँ तेजी से फैलती हैं। पंजाब में सरकार को चाहिए कि गाँव-गाँव फॉगिंग और ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव करवाए और राहत शिविरों में स्वच्छ शौचालय तथा ORS पैकेट उपलब्ध कराए। बच्चों और बुजुर्गों का तत्काल टीकाकरण करना बेहद ज़रूरी है क्योंकि यही वर्ग सबसे अधिक संवेदनशील होता है।
हरियाणा में समस्या दोहरी है। यहाँ के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्र प्रभावित होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खेत और गाँव पानी में डूब जाते हैं, वहीं शहरी क्षेत्रों में सीवर और नालियों का गंदा पानी घरों तक पहुँच जाता है। औद्योगिक इलाकों से निकलने वाला कचरा और केमिकल बाढ़ के पानी में मिलकर स्वास्थ्य संकट को और गहरा कर देते हैं। ऐसे में हरियाणा सरकार को चाहिए कि शहरों की नालियों और सीवर की तुरंत सफाई करे, जलभराव को मशीनों से निकाले और स्वास्थ्य विभाग की हेल्पलाइन को चौबीसों घंटे सक्रिय रखे।
जम्मू-कश्मीर की वादियाँ भी इस आपदा से अछूती नहीं रहीं। 2014 की बाढ़ का खौफ अभी भी लोगों की यादों में ताजा है। इस बार फिर पानी ने घाटियों को अपनी चपेट में लिया और कई गाँव राहत से वंचित रह गए। ठंडे मौसम के कारण यहाँ श्वसन रोग तेजी से फैलते हैं। बुजुर्गों और बच्चों की हालत ज्यादा खराब होती है। सरकार को चाहिए कि सेना की मदद से मोबाइल अस्पताल और हेल्थ कैंप स्थापित करे, लोगों को गर्म कपड़े और आवश्यक दवाएँ उपलब्ध कराए तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे WHO से भी सहयोग मांगे ताकि पर्याप्त मेडिकल स्टाफ और उपकरण उपलब्ध कराए जा सकें।
अब सवाल यह उठता है कि सरकार को तात्कालिक तौर पर कौन-कौन से कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले हर प्रभावित इलाके में स्वास्थ्य शिविर और मोबाइल अस्पताल स्थापित किए जाएँ। स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित हो, जिसके लिए टैंकरों से साफ पानी पहुँचाना, क्लोरीन टैबलेट और अस्थायी आरओ प्लांट लगाना ज़रूरी है। मच्छरों से बचाव के लिए ब्लीचिंग पाउडर और फॉगिंग का इस्तेमाल किया जाए। राहत शिविरों में साफ शौचालय, कचरे के उचित प्रबंधन और सुरक्षित पानी का इंतज़ाम हो। सरकार को दवाओं का पर्याप्त भंडारण करना चाहिए, खासकर ORS, एंटीबायोटिक्स, पेरासिटामोल और बच्चों तथा बुजुर्गों के लिए टीकों का इंतज़ाम करना बेहद आवश्यक है।
लेकिन केवल सरकार पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। नागरिकों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। हर घर में पानी उबालकर पीने की आदत डालनी चाहिए, खाने को ढककर रखना चाहिए और हाथों को साबुन से धोने की आदत को प्राथमिकता देनी चाहिए। मच्छरों से बचाव के लिए मच्छरदानी और रिपेलेंट का प्रयोग करना चाहिए। अगर किसी इलाके में दस्त, उल्टी, बुखार या खांसी-जुकाम के मामले अचानक बढ़ रहे हों तो तुरंत स्वास्थ्य विभाग को सूचित करना चाहिए ताकि महामारी फैलने से पहले ही कदम उठाए जा सकें। मोहल्ले और गाँव स्तर पर सामूहिक सफाई अभियान चलाने चाहिए ताकि कहीं पानी ठहरने न पाए।
यह भी ज़रूरी है कि हम केवल तात्कालिक राहत पर न रुकें बल्कि दीर्घकालीन नीति और तैयारी पर ध्यान दें। हर ज़िले में एक स्थायी आपदा स्वास्थ्य टीम बनाई जाए जो आपात स्थिति में तुरंत सक्रिय हो सके। ड्रोन और मोबाइल ऐप जैसी तकनीक का इस्तेमाल करके बाढ़ प्रभावित इलाकों में पानी ठहरने की निगरानी और बीमारियों की रिपोर्टिंग की जाए। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में नालों और सीवर की नियमित सफाई की जाए ताकि पानी दूषित न हो। स्कूलों और पंचायतों में जनजागरूकता अभियान चलाकर लोगों को बाढ़ और बीमारियों से निपटने की ट्रेनिंग दी जाए। हमें 2013 की उत्तराखंड त्रासदी और 2014 की कश्मीर बाढ़ से सबक लेकर आज बेहतर तैयारी करनी होगी।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी यह समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन के दौर में बाढ़ जैसी आपदाएँ अब बार-बार आने लगी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्पष्ट कहा है कि आपदा के बाद अगर तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो महामारी का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। बांग्लादेश, फिलीपींस और नेपाल जैसे देशों ने भी बाढ़ के बाद महामारी का सामना किया है। भारत के लिए यह ज़रूरी है कि वह आपदा प्रबंधन को केवल राहत तक सीमित न रखे बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा को भी प्राथमिकता दे।
अंततः निष्कर्ष यही है कि बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है, लेकिन इसके बाद फैलने वाली बीमारियाँ हमारी तैयारी और जागरूकता पर निर्भर करती हैं। अगर सरकार, समाज और नागरिक मिलकर काम करें तो उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को महामारी के खतरे से बचाया जा सकता है। सरकार को चाहिए कि राहत से आगे बढ़कर दीर्घकालीन स्वास्थ्य सुरक्षा तंत्र बनाए, नागरिकों को चाहिए कि व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर स्वच्छता और सतर्कता को अपनाएँ। अगर हम समय रहते जागरूक हो जाएँ तो बाढ़ की त्रासदी को महामारी बनने से रोका जा सकता है और यही हमारी असली जीत होगी।

