जब साईं बाबा ने चक्की चलाकर आटा नहीं, हैजा को पिसा
॥ श्री साईंनाथ महाराज की जय ॥🌹
साईं बाबा की लीलाएँ युगों-युगों तक भक्तों को राह दिखाती रही हैं। उनका हर कार्य साधारण आँखों से देखने पर सामान्य लगता है, लेकिन उसमें छिपा आध्यात्मिक अर्थ जब खुलता है तो वह साधक के जीवन को परिवर्तित कर देता है। श्री साईं सच्चरित्र का पहला अध्याय बाबा की ऐसी ही अद्भुत लीला को प्रस्तुत करता है, जब उन्होंने शिर्डी में चक्की मँगाई और गेहूँ पीसना शुरू किया।
उस समय गाँव में हैजा और बुखार जैसी बीमारियाँ फैल रही थीं। लोग डरे हुए थे, जीवन असुरक्षित लग रहा था। अचानक बाबा ने एक चक्की मँगवाई और गेहूँ पीसने लगे। वहाँ उपस्थित भक्त यह देखकर चकित रह गए कि बाबा क्यों चक्की पीस रहे हैं। धीरे-धीरे पूरा गाँव इकट्ठा हो गया। लोगों ने देखा कि बाबा निरंतर श्रम कर रहे हैं, चक्की घूम रही है और गेहूँ धीरे-धीरे आटे में बदल रहा है। किसी ने सोचा बाबा आटा तैयार कर भक्तों को भोजन कराएँगे, किसी ने इसे साधारण घटना समझा, पर जब बाबा ने आटे को बाँटकर कहा कि इसे अपने-अपने घरों में चारों ओर छिड़क दो, तो सभी ने आज्ञा का पालन किया।
आश्चर्य की बात यह हुई कि कुछ ही दिनों में गाँव से हैजा और बीमारियों का प्रकोप शांत हो गया। तब सबको समझ आया कि बाबा ने आटा नहीं, बल्कि बीमारी और संकट को पीसकर समाप्त कर दिया। इसलिए लोग कहते हैं कि उस दिन साईं बाबा ने चक्की चलाकर आटा नहीं, बल्कि हैजा को पिसा था।
यह लीला केवल बीमारी मिटाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें गहन आध्यात्मिक संदेश छिपा था। कबीरदास ने कहा है:
“चक्की चले संसार में, कोई न बख़से कोय।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय॥”
यह संसार भी एक चक्की है। इसके दो पाट हैं – जीवन और मृत्यु, सुख और दुख, भक्ति और कर्म। इनके बीच आकर हर जीव पिसता है। कोई भी इससे बच नहीं सकता। लेकिन यदि गुरु कृपा हो और साधक अपने दोषों को चक्की में पीस दे तो यह पीसना दुख का कारण न होकर आत्मशुद्धि का मार्ग बन जाता है।
भक्ति और कर्म – यही जीवन के दो पाट हैं। यदि केवल भक्ति की जाए और कर्म को छोड़ दिया जाए तो साधना अधूरी रहती है। और यदि केवल कर्म किया जाए, भक्ति का आधार न हो, तो कर्म बंधनकारी बन जाता है। बाबा की चक्की इस संतुलन का प्रतीक थी। उन्होंने अपने जीवन से दिखाया कि भक्ति और कर्म का संगम ही सच्चा धर्म है।
चक्की का घूमना गुरु उपदेश का भी प्रतीक है। जैसे चक्की बार-बार घूमती है और धीरे-धीरे अनाज को आटे में बदल देती है, वैसे ही गुरु की वाणी साधक के जीवन में बार-बार आती है। हर बार सुनने और मनन करने से साधक का अहंकार, आलस्य और अज्ञान धीरे-धीरे पीसता है और अंत में ज्ञान और भक्ति का आटा तैयार होता है। यही आटा आत्मा का पोषण करता है।
उस दिन बाबा के हाथों से मिला आटा भक्तों ने अपने घरों में आदर से रखा। किसी ने उससे भोजन बनाया, किसी ने उसे प्रसाद माना और किसी ने उसे पूजा के स्थान पर रख दिया। सभी ने अनुभव किया कि यह आटा साधारण नहीं, बल्कि बाबा की कृपा का प्रसाद है।
आज जब हम इस कथा को पढ़ते हैं तो समझ में आता है कि आधुनिक जीवन की चक्की भी निरंतर घूम रही है। विज्ञान, तकनीक, राजनीति, प्रतिस्पर्धा – सब मिलकर मनुष्य को पीस रहे हैं। लोग तनाव, रोग और अशांति से घिरे हैं। ऐसे समय में यदि हम गुरु की शरण में जाएँ, भक्ति और कर्म दोनों का संतुलन साधें, तो यह चक्की हमें दुखी करने के बजाय हमें शुद्ध कर देगी।
साईं बाबा की चक्की-लीला हमें यह सिखाती है कि जब जीवन में हैजा रूपी संकट आए – चाहे वह बीमारी हो, दुख हो या मोह-माया – हमें घबराना नहीं चाहिए। हमें अपनी कमजोरियों और दोषों को गुरु चरणों में अर्पित कर देना चाहिए। जब गुरु की कृपा की चक्की चलेगी तो हमारे भीतर का लोभ, मोह और अहंकार पिस जाएगा और हमें मिलेगा केवल शांति, प्रेम और भक्ति का आटा। यही जीवन का परम उद्देश्य है।
* 🙏🌹भक्तिपूर्ण प्रार्थना
हे साईंनाथ!
आपकी चक्की-लीला ने हमें भक्ति और कर्म का सत्य दिखाया,
आपने आटा नहीं, हमारे पाप-दोष और रोगों को पीसा,
आपने दिखाया कि गुरु कृपा से हर संकट समाप्त हो जाता है।
हे दयामूर्ति बाबा!
हमारे भीतर जो अहंकार, लोभ और मोह के बीज हैं,
उन्हें अपनी कृपा-चक्की में पीसकर भक्ति और ज्ञान में बदल दीजिए।
हमारे जीवन में भक्ति और कर्म का संतुलन बना दीजिए।
हे साईंनाथ!
हमें आपकी शरण का आटा दीजिए,
जिससे हमारी आत्मा तृप्त हो और संसार के रोग दूर हों।
हमेशा आपके चरणों में हमारा मन लगा रहे,
यही हमारी सबसे बड़ी कामना और प्रार्थना है।
॥ श्री साईंनाथ महाराज की जय ॥

महंत कोमल रमोला जी महाराज( वरिष्ठ पत्रकार)
संचालक शिरडी साईं मंदिर टगरा कालका, पंचकूला ( हरियाणा)

