वीरवार का दिन पंजाब की राजनीति और सामाजिक जीवन के लिए विशेष महत्व रखता है। यह दिन उन हज़ारों किसानों के लिए आशा का प्रतीक बनकर सामने आया, जो बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे हैं और जिनकी आँखों में धान की लहलहाती फसलें डूब जाने का दर्द साफ झलकता है। इस दिन केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पंजाब का दौरा किया। उनका यह दौरा किसी रस्मी परंपरा की तरह नहीं था, बल्कि यह उस संवेदनशीलता का परिचायक था, जिसकी किसानों को सबसे अधिक आवश्यकता थी। यह यात्रा किसानों के आंसू पोंछने, उनके मनोबल को संभालने और यह भरोसा दिलाने की कोशिश थी कि देश की सर्वोच्च सत्ता उनकी पीड़ा से अनभिज्ञ नहीं है।
पंजाब को अक्सर “अन्नदाता” कहा जाता है, क्योंकि दशकों से यह प्रदेश पूरे भारत की थाली में अन्न भरने का काम करता आया है। लेकिन इस वर्ष की बाढ़ ने किसानों की कमर तोड़ दी है। आंकड़े बताते हैं कि चार लाख एकड़ से अधिक कृषि भूमि जलमग्न हो चुकी है। कहीं धान की फसल बर्बाद हो गई है तो कहीं सब्ज़ियों और मक्के की पैदावार पूरी तरह चौपट हो गई। गांवों में कच्चे मकान ढह गए हैं, पशुधन बह गया है और हजारों परिवार राहत शिविरों में शरण लेने को विवश हैं। ऐसे समय में यदि केंद्र का कृषि मंत्री स्वयं किसानों के बीच जाकर उनके दर्द को महसूस करता है, तो उसका मनोवैज्ञानिक असर किसी राहत पैकेज से कम नहीं होता। किसानों को यह भरोसा मिलता है कि वे अकेले नहीं हैं, देश उनके साथ है।
शिवराज सिंह चौहान का यह दौरा तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण रहा। पहला, उन्होंने स्वयं खेतों में उतरकर वास्तविक नुकसान का जायज़ा लिया। अक्सर उच्च अधिकारी और मंत्री केवल फाइलों और रिपोर्टों पर भरोसा करते हैं, लेकिन चौहान ने गांवों की गलियों में जाकर किसानों की समस्याएं सुनीं। अमृतसर, कपूरथला और गुरदासपुर जिलों में उन्होंने किसानों के साथ जमीन पर बैठकर संवाद किया। यह दृश्य केवल एक राजनीतिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि सत्ता का शीर्षस्थ व्यक्ति भी किसान के दुख में भागीदार है।
दूसरा, यह दौरा प्रशासनिक दृष्टि से भी अहम था। केंद्र सरकार पहले ही दो उच्चस्तरीय टीमों को पंजाब भेज चुकी थी, जो बाढ़ से हुए नुकसान का विस्तृत आकलन कर रही हैं। इन टीमों में कृषि, ग्रामीण विकास, सड़क, जल शक्ति, वित्त और ऊर्जा मंत्रालयों के अधिकारी शामिल हैं। चौहान ने स्पष्ट किया कि इन रिपोर्टों के आधार पर ही केंद्र सरकार राहत पैकेज और पुनर्वास योजनाओं का ऐलान करेगी। उनका यह आश्वासन किसानों के लिए राहत भरा रहा कि मुआवज़ा केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि केंद्र भी सक्रिय भूमिका निभाएगा।
तीसरा, यह दौरा राजनीतिक संवाद का मंच भी बना। पंजाब सरकार के कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां ने केंद्रीय मंत्री से आग्रह किया कि प्रति एकड़ मुआवज़े की राशि मौजूदा ₹6,800 से बढ़ाकर ₹50,000 की जाए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी मांग रखी कि केंद्र द्वारा रोके गए लगभग ₹8,000 करोड़ (आरडीएफ और एमडीएफ मद से संबंधित) तुरंत जारी किए जाएं, ताकि राज्य सरकार किसानों को राहत पहुंचा सके। यह मांगें भले ही राजनीतिक प्रतीत होती हों, लेकिन उनका आधार सामाजिक और मानवीय भी है। जब लाखों किसान तबाह हो चुके हों, तो मुआवज़ा और राहत की बहस स्वाभाविक ही है।
इस पूरे घटनाक्रम में दो बड़े प्रश्न उभरते हैं। पहला प्रश्न यह है कि क्या केंद्र और राज्य सरकारें आपदा प्रबंधन में समय पर और प्रभावी ढंग से काम कर रही हैं? और दूसरा प्रश्न यह है कि क्या हमारी कृषि नीति प्राकृतिक आपदाओं की चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्याप्त है? बाढ़ केवल पंजाब की समस्या नहीं है। बिहार, असम, उत्तर प्रदेश और हिमालयी राज्यों में हर साल यही कहानी दोहराई जाती है। लाखों एकड़ भूमि डूब जाती है, किसान तबाह हो जाते हैं और सरकार राहत पैकेज की घोषणा करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल राहत और मुआवज़ा ही समाधान है?
दरअसल, इस आपदा ने हमें चेतावनी दी है कि हमें अब “रिस्पॉन्सिव” नीति से आगे बढ़कर “प्रिवेंटिव” नीति अपनानी होगी। पंजाब जैसे राज्य, जहां धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है, वहां जल प्रबंधन की ठोस रणनीति बनानी होगी। नदियों के तटबंधों को मजबूत करना होगा, बारिश के पानी को रोकने और सहेजने की व्यवस्था करनी होगी और फसल बीमा योजना को इस तरह क्रियाशील बनाना होगा कि आपदा के समय किसान तुरंत उसका लाभ उठा सकें। अगर केंद्र और राज्य मिलकर इन पहलुओं पर काम करें, तो भविष्य में ऐसी त्रासदी से होने वाला नुकसान काफी हद तक कम किया जा सकता है।
शिवराज सिंह चौहान का यह दौरा इसी संदर्भ में उम्मीद की किरण है। उनके शब्दों में स्पष्ट झलकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं स्थिति पर नज़र रखे हुए हैं और उन्होंने पंजाब के किसानों की मदद करने का आश्वासन दिया है। चौहान ने किसानों को भरोसा दिलाया कि राहत और पुनर्वास में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। यह भरोसा किसानों के मनोबल के लिए उतना ही जरूरी है जितना उनके खेतों के लिए पानी का निकलना।
यह भी सत्य है कि केवल दौरे और घोषणाओं से किसानों की जिंदगी नहीं बदलती। ज़रूरत है कि घोषणाएं जमीनी हकीकत में उतरें। यदि किसानों को समय पर मुआवज़ा नहीं मिला, यदि पुनर्वास योजनाएं फाइलों में अटकी रह गईं, तो यह दौरा भी इतिहास में केवल एक राजनीतिक रस्म के रूप में दर्ज हो जाएगा। लेकिन यदि केंद्र और राज्य मिलकर किसानों को त्वरित राहत पहुंचाने में सफल रहे, तो यह दौरा पंजाब की कृषि पुनर्निर्माण यात्रा का महत्वपूर्ण अध्याय बन सकता है।
केंद्र और राज्य के बीच समन्वय इस समय सबसे बड़ी आवश्यकता है। पंजाब की बाढ़ किसी एक राज्य की समस्या नहीं है, यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का प्रश्न है। यदि पंजाब की धान की फसल बर्बाद होती है, तो उसका असर देश की थाली तक पहुंचेगा। ऐसे में यह जरूरी है कि राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार कर, सभी दल और सभी सरकारें मिलकर किसानों को सहारा दें।
4 सितंबर का दौरा पंजाब के किसानों के लिए राहत का पैग़ाम है। यह दिखाता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग भी जब संकट की घड़ी में जनता के बीच उतरते हैं, तो उसका असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और मानवीय स्तर पर गहरा पड़ता है। पंजाब की बाढ़ ने हमें चेताया है कि हमें कृषि और आपदा प्रबंधन की नीति में बड़े बदलाव करने होंगे। यदि हम इस चेतावनी को गंभीरता से लेंगे, तभी किसानों का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा और तभी ऐसे दौरे केवल सांत्वना नहीं, बल्कि वास्तविक समाधान का प्रतीक बन पाएंगे।

पार्वती रमोला
संपादक

