“सब प्राणियों में ईश्वर का ही वास है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव करो”

 

श्री साई सच्चरित्र  के  अध्याय 9 से भक्तों को किया शिक्षा ,प्रेरणा  और आशीर्वाद मिलता है

लेखक : कोमल चंद रमोला ( वरिष्ठ पत्रकार)

संचालक : साईं मंदिर कालका

मानव जीवन में सत्य की खोज एक अनवरत यात्रा है। जब-जब मानवता भ्रम और अंधकार में भटकने लगती है, तब-तब दिव्य महापुरुष अपने आचरण और उपदेशों के द्वारा हमें स्मरण कराते हैं कि परम सत्य कहीं बाहर नहीं, बल्कि हर प्राणी के भीतर विद्यमान है। श्री साईबाबा का जीवन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। शिरडी के इस फकीर ने साधारण जीवन जीते हुए, सामान्य घटनाओं को आधार बनाकर ही उपनिषद, गीता और भागवत जैसे गूढ़ शास्त्रों की शिक्षाओं को सरल और अनुभवसिद्ध रूप में प्रस्तुत किया।

श्री साई सच्चरित्र के अध्याय–९ में यही महान् सत्य विस्तार से प्रकट होता है कि “ईश्वर सर्वव्यापी है, हर जीव में वही वास करता है और उसका प्रत्यक्ष अनुभव करो।” इस अध्याय में कई घटनाओं के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि गुरु की आज्ञा मानने वाला सुरक्षित रहता है, अवज्ञा करने वाला कठिनाइयों में पड़ता है; भिक्षावृत्ति का गूढ़ अर्थ क्या है; भेंट और नैवेद्य का महत्व क्या है; और अंततः यह कि हर जीव में भगवान स्वयं विद्यमान हैं।

बाबा के आदेश और आज्ञापालन का महत्व

शिरडी यात्रा की विशेषता यह थी कि बाबा की अनुमति के बिना कोई भी भक्त शिरडी से प्रस्थान नहीं करता था। जो उनकी आज्ञा मानकर लौटते, वे सुख-शांति से घर पहुँचते; और जो अवज्ञा करते, उन्हें दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता।

तात्या कोते पाटील का प्रसंग इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। एक दिन वे ताँगे में बैठकर कोपरगाँव जाने लगे। बाबा ने उन्हें रोका और कहा कि आज बाहर मत जाओ। उनकी उतावली देखकर बाबा ने कम-से-कम शामा को साथ ले जाने का आग्रह किया। परन्तु तात्या ने यह सब अनसुना कर दिया। नतीजा यह हुआ कि रास्ते में घोड़े को मोच आ गई और दुर्घटना हो गई। भले ही तात्या को गहरी चोट न आई, परन्तु उन्हें तुरंत बाबा की आज्ञा याद आ गई।

यही घटना एक यूरोपियन महाशय के साथ भी घटी। वे नानासाहेब चाँदोरकर के पत्र से शिरडी आए और बाबा के दर्शन करना चाहा। परन्तु बाबा ने उन्हें समीप आने नहीं दिया और केवल आँगन से ही दर्शन करने को कहा। अप्रसन्न होकर उन्होंने तुरंत प्रस्थान करने का निश्चय किया। बाबा ने रोका कि जल्दी मत करो, कल जाओ। परन्तु वे नहीं माने और ताँगे में बैठ गए। थोड़ी ही दूर पर घोड़े बाइसिकिल देखकर बिदक गए और ताँगा उलट गया। महाशय चोटिल होकर अस्पताल पहुँचे।

इन घटनाओं से स्पष्ट है कि गुरु का आदेश केवल शब्द नहीं होता, बल्कि उसके पीछे अदृश्य कृपा और जीवन की रक्षा छिपी होती है। भक्त यदि विश्वास और आज्ञापालन करता है तो सुरक्षित रहता है, यदि अवज्ञा करता है तो विपत्ति आती है। यही गुरु-भक्ति की नींव है।

 

 भिक्षावृत्ति का गूढ़ संदेश

कई लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि बाबा जैसे समर्थ महापुरुष ने आजीवन भिक्षावृत्ति क्यों की। इसका उत्तर दो दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है।

पहला दृष्टिकोण यह है कि शास्त्रानुसार केवल वही संन्यासी भिक्षा के अधिकारी होते हैं जिन्होंने काम, धन और यश की आसक्ति का त्याग कर दिया हो। बाबा न तो गृहस्थ थे और न ही वानप्रस्थी। वे तो आजन्म ब्रह्मचारी और परमात्मा के अवतार थे। अतः वे भिक्षावृत्ति के पूर्ण अधिकारी थे।

दूसरा दृष्टिकोण और भी गहरा है। गृहस्थ जीवन में पंचसूना कहलाने वाले पाँच अनिवार्य पाप प्रतिदिन होते हैं – अन्न पीसने, पकाने, धोने, पानी निकालने और चूल्हा जलाने में अनगिनत जीवों की हिंसा होती है। इसके प्रायश्चित स्वरूप शास्त्रों ने पाँच यज्ञ बताए – ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ। जब बाबा घर-घर भिक्षा माँगने जाते थे तो वे वस्तुतः गृहस्थों को यह स्मरण दिलाते थे कि अपने दैनिक कर्मों का प्रायश्चित करो और दान-धर्म से अपने जीवन को पवित्र बनाओ।

इस प्रकार बाबा की भिक्षावृत्ति केवल रोटी माँगना नहीं थी, बल्कि शिक्षा और साधना का जीवंत माध्यम थी।

भेंट और नैवेद्य का भाव

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं – पत्रं पुष्पं फलं तोयं – यदि कोई भक्त शुद्ध भाव से पत्र, पुष्प, फल या जल भी अर्पित करे तो मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ। बाबा भी यही शिक्षा अपने जीवन से देते थे।

श्री तर्खड परिवार की घटनाएँ इसका प्रमाण हैं। एक बार तर्खडजी पूजा के दौरान नैवेद्य अर्पित करना भूल गए। उसी समय शिरडी में बाबा ने उनकी पत्नी से कहा कि “मैं बाँद्रा गया था, परंतु मेरे लिए कुछ खाने को नहीं रखा गया।” इससे सबको स्पष्ट हो गया कि बाबा हर भक्त के घर में अदृश्य रूप से विद्यमान रहते हैं और उनकी भक्ति व स्मरण को स्वीकार करते हैं।

इसी प्रकार एक छोटा-सा पेड़ा, जो श्रीमती तर्खड ने प्रेम से भेजा था, बाबा ने तुरंत स्वीकार कर लिया। यह भक्त के प्रेम का महत्व है, न कि वस्तु की बड़ी या छोटी मात्रा का।

“सब प्राणियों में ईश्वर” की प्रत्यक्ष शिक्षा

अध्याय–९ का सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग वह है जब श्रीमती तर्खड ने भूखे कुत्ते को रोटी खिलाई। सन्ध्या समय बाबा ने उनसे कहा – “माँ, आज तुमने मुझे बड़े प्रेम से खिलाया। पहले भूखों को भोजन कराओ, बाद में स्वयं भोजन करो। तुमने जो रोटी कुत्ते को दी थी, वह वास्तव में मुझे ही दी थी। मैं ही उन सब प्राणियों के रूप में विचरता हूँ।”

यह उपदेश अद्वैत वेदांत का जीवंत रूप है। गीता (६/३०) में श्रीकृष्ण कहते हैं – यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति… – जो मुझे हर जगह देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, मैं उससे कभी अलग नहीं होता। बाबा ने इसे अनुभव से सिद्ध कर दिया कि हर प्राणी में परमात्मा का ही वास है।

 

व्यावहारिक संदेश

इस अध्याय से हमें तीन प्रमुख शिक्षाएँ मिलती हैं –

1. गुरु की आज्ञा पालन ही सुरक्षा और कल्याण है।

2. भिक्षावृत्ति के माध्यम से बाबा ने गृहस्थों को दान, यज्ञ और प्रायश्चित की याद दिलाई।

3. हर जीव में ईश्वर का दर्शन करो, तभी सच्ची भक्ति और सेवा है।

 

निष्कर्ष

अध्याय–९ हमें यह स्मरण कराता है कि धर्म केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि व्यवहार और दृष्टिकोण में है। यदि हम गुरु के वचन पर विश्वास करें, यदि हम श्रद्धा से अर्पण करें, यदि हम हर जीव में भगवान का रूप देखें, तो यही सच्चा अध्यात्म है।

श्री साईबाबा ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि ईशावास्यमिदं सर्वम् – समस्त प्राणियों में ईश्वर का ही वास है। जो इसे अनुभव करता है वही वास्तविक भक्त है। यही इस अध्याय की आत्मा है और यही बाबा की शिक्षा।

।। श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु ।। शुभं भवतु ।।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *