एनडीए नीतीश के नेतृत्व में फिर से सत्ता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है

पार्वती रमोला
संपादक

एनडीए नीतीश के नेतृत्व में फिर से सत्ता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है

बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। आज अमित शाह ने बिहार की एक जनसभा में ऐसा बयान दिया जिसने पूरे राज्य की सियासत को हिला कर रख दिया। उन्होंने मंच से कहा “विपक्ष के लिए ना मुख्यमंत्री का पद खाली है, ना प्रधानमंत्री का, क्योंकि बिहार में नीतीश हैं और केंद्र में मोदी हैं।” यह वाक्य केवल चुनावी बयान नहीं बल्कि एक राजनीतिक घोषणा थी, जिसने साफ कर दिया कि बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए का चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे। बीजेपी ने एक बार फिर नीतीश पर भरोसा जताकर यह संकेत दे दिया कि बिहार में सत्ता की चाबी अब उनके ही हाथ में रहेगी।

बीजेपी की यह रणनीति बहुत सोच-समझकर बनाई गई चाल है। पिछले कुछ वर्षों में बिहार में गठबंधन की राजनीति ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी नीतीश ने एनडीए छोड़ा, कभी लौट आए, लेकिन हर बार उनका राजनीतिक महत्व बरकरार रहा। अमित शाह का यह बयान दरअसल उस स्थिरता की घोषणा है, जिसकी बिहार की राजनीति को लंबे समय से तलाश थी। बीजेपी यह अच्छी तरह समझ चुकी है कि नीतीश को साथ रखे बिना बिहार में सत्ता हासिल करना लगभग असंभव है। इसलिए अब उसने यह तय कर लिया है कि नीतीश को आगे रखकर पूरे एनडीए गठबंधन को एक स्थायी चेहरा और दिशा दी जाएगी।

नीतीश कुमार का राजनीतिक अनुभव, उनकी प्रशासनिक पकड़ और “सुशासन बाबू” की छवि उन्हें बिहार की जनता के बीच एक स्वीकार्य नेता बनाती है। बीजेपी की नजर में यही वह संतुलन है जो एनडीए को एक बार फिर बहुमत तक पहुंचा सकता है। मोदी सरकार के “डबल इंजन” वाले विकास मॉडल को अगर बिहार में जनसमर्थन मिलना है, तो उसमें नीतीश का चेहरा अनिवार्य है। इसीलिए अमित शाह ने खुले मंच से यह संदेश दे दिया कि एनडीए के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तय है, और अब किसी को भ्रम में रहने की ज़रूरत नहीं।

यह बयान विपक्ष के लिए भी एक सीधा संदेश है। जिस तरह आरजेडी, कांग्रेस और अन्य दलों के गठबंधन में मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर मतभेद और असमंजस है, उसके ठीक उलट एनडीए ने साफ़-साफ़ बता दिया कि उनके यहां नेतृत्व स्पष्ट है। जनता के सामने यह संदेश जाता है कि एनडीए में न कोई आंतरिक कलह है, न ही किसी प्रकार की नेतृत्वहीनता। अमित शाह का बयान विपक्ष को मनोवैज्ञानिक तौर पर कमजोर करने का भी तरीका है क्योंकि जब जनता को यह भरोसा मिल जाता है कि गठबंधन में स्थिरता है, तो वोटिंग पैटर्न भी उसी दिशा में झुक जाता है।

बीजेपी की रणनीति में यह घोषणा एक चुनावी ब्रह्मास्त्र की तरह काम करेगी। अब एनडीए का पूरा अभियान “केंद्र में मोदी, राज्य में नीतीश” के नारे पर आधारित होगा। यह दोहरा नेतृत्व बिहार के मतदाताओं के लिए आकर्षक है एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और दूसरी ओर नीतीश की स्थानीय स्वीकार्यता। बीजेपी को यह भी उम्मीद है कि इस जोड़ी से सवर्ण, ओबीसी, दलित और महिला वोटरों का एक बड़ा वर्ग फिर से एक साथ आएगा। नीतीश की शराबबंदी, महिला सशक्तिकरण और शिक्षा योजनाओं का लाभ उठाने वाली महिलाओं का झुकाव फिर से एनडीए की ओर लौट सकता है।

वहीं अमित शाह के बयान ने बिहार के विपक्ष को पूरी तरह रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है। तेजस्वी यादव जहां बेरोजगारी, महंगाई और केंद्र की नीतियों पर हमला बोलने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं बीजेपी ने यह साफ कर दिया है कि वह चुनाव को “नेतृत्व बनाम नेतृत्व” की लड़ाई बनाएगी। जनता अब केवल वादों पर नहीं बल्कि भरोसे और स्थिर नेतृत्व पर वोट देना चाहती है। नीतीश का नाम सामने आने के बाद एनडीए को यह बढ़त मिल गई है कि उनके पास अनुभव और कार्यशैली दोनों का मिश्रण मौजूद है।

बीजेपी और जेडीयू दोनों के लिए यह घोषणा आंतरिक रूप से भी फायदेमंद साबित हो सकती है। बीजेपी का कोर वोट बैंक पहले से मज़बूत है, लेकिन नीतीश के साथ आने से उसे उन क्षेत्रों में बढ़त मिल सकती है जहां अब तक जेडीयू की जड़ें मज़बूत थीं। खासकर ग्रामीण इलाकों और पिछड़े वर्गों में नीतीश का प्रभाव अब भी कायम है। ऐसे में अगर यह गठबंधन एकजुट रहकर चुनाव में उतरता है तो विपक्ष के लिए यह मुकाबला बेहद कठिन हो जाएगा।

अमित शाह की इस घोषणा ने न केवल बिहार में राजनीतिक दिशा तय की है बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी एक संकेत दिया है कि मोदी सरकार अपने पुराने और भरोसेमंद सहयोगियों के साथ ही 2029 की बड़ी रणनीति बना रही है। बिहार में यह प्रयोग बीजेपी के लिए एक टेस्ट केस की तरह होगा अगर नीतीश को चेहरा बनाकर एनडीए दोबारा सत्ता में लौटता है, तो यह फॉर्मूला दूसरे राज्यों में भी लागू किया जा सकता है जहां क्षेत्रीय नेताओं के साथ गठबंधन बनाना बीजेपी के लिए आवश्यक है।

अब सवाल यह नहीं है कि एनडीए का चेहरा कौन होगा, बल्कि यह है कि विपक्ष इसके मुकाबले कौन सा नेतृत्व पेश करेगा। जनता के सामने जब दोनों पक्षों की तस्वीर साफ़ होती है, तो स्थिरता का विकल्प अधिक प्रभावी हो जाता है। अमित शाह का बयान इस दृष्टि से बीजेपी की रणनीतिक चाल है एक ऐसा कदम जो चुनाव से पहले ही यह माहौल बना दे कि “सरकार तय है, चेहरा तय है, और दिशा तय है।”

बिहार की जनता के सामने अब एक स्पष्ट विकल्प है केंद्र में नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और राज्य में नीतीश कुमार का प्रशासनिक अनुभव। अगर यह गठबंधन अपनी एकता बनाए रखता है और विकास, रोजगार व सामाजिक संतुलन के एजेंडे पर एकजुट होकर प्रचार करता है, तो 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए की वापसी लगभग सुनिश्चित दिखती है। यह केवल एक राजनीतिक समझौता नहीं बल्कि एक सोच का मिलन है विकास, स्थिरता और सुशासन की सोच।

इस तरह अमित शाह का आज का बयान केवल चुनावी घोषणा नहीं बल्कि बिहार की राजनीति की नई दिशा का उद्घोष है जहां एनडीए नीतीश के नेतृत्व में फिर से सत्ता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है और बीजेपी ने अपने पुराने सहयोगी पर एक बार फिर भरोसा जताकर बिहार के राजनीतिक समीकरण को स्थायित्व देने का संकेत दे दिया है।

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