प्रो. संपत सिंह की वापसी इनेलो के लिए यह संजीवनी समान है

रिपोर्ट : प्रीति कंबोज

चंडीगढ़ : हरियाणा की राजनीति में इस समय जो सबसे चर्चित घटनाक्रम सामने आया है वह है वरिष्ठ नेता प्रोफेसर संपत सिंह का कांग्रेस से इस्तीफा देकर एक बार फिर इनेलो की ओर लौट आना। राजनीति में कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब पुरानी राहों की पुकार फिर से सुनाई देती है और यही कुछ इस बार हुआ है। यह केवल एक व्यक्ति का पार्टी परिवर्तन नहीं बल्कि हरियाणा की राजनीतिक दिशा और विपक्षी दलों की संभावनाओं से जुड़ा बड़ा संकेत है। प्रोफेसर संपत सिंह ने जब कांग्रेस छोड़ने का निर्णय लिया तो यह महज़ नाराज़गी का परिणाम नहीं था बल्कि उस भीतर ही भीतर पनप रहे असंतोष का प्रतिबिंब था जो पिछले कुछ समय से कांग्रेस की हरियाणा इकाई में महसूस किया जा रहा था। उन्होंने खुले शब्दों में कहा कि पार्टी परिवारवाद की जकड़ में आ चुकी है और वरिष्ठ नेताओं की आवाज़ दबा दी जाती है। टिकट बंटवारे और निर्णयों में पारदर्शिता की कमी, जवाबदेही का अभाव और नेतृत्व के सीमित दायरे ने उन्हें निराश किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में निष्ठा का पुरस्कार गुलामी है और असहमति की सजा निर्वासन। यह कथन केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं बल्कि उस पार्टी संस्कृति की आलोचना है जिसमें लोकतांत्रिक संवाद की जगह गुटबाज़ी और पारिवारिक नियंत्रण ने ले ली है।

संपत सिंह लंबे समय से हरियाणा की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। छह बार के विधायक और कई बार मंत्री रह चुके संपत सिंह का राजनीतिक सफर शिक्षण से शुरू हुआ था। एक शिक्षक से लेकर मंत्री बनने तक का उनका सफर बताता है कि वे विचारशील, अनुभवी और जनाधार वाले नेता हैं। उन्होंने कभी इनेलो के साथ राजनीति शुरू की थी, फिर परिस्थितियों के चलते कांग्रेस में चले गए और अब जब उन्हें लगा कि वहां विचार और सम्मान दोनों का स्थान घट गया है तो उन्होंने अपने पुराने घर लौटने का फैसला किया। उनका यह कहना कि “मुझे लगता है मैं अपने घर वापस आ गया हूं” दरअसल उस भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है जो किसी संगठन की विचारधारा के साथ होता है।

कांग्रेस छोड़ने के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने इनेलो की सदस्यता ग्रहण की। यह वापसी औपचारिक और गरिमामयी तरीके से हुई। अभय चौटाला की उपस्थिति में जब उन्होंने पार्टी का झंडा थामा तो मंच से लेकर कार्यकर्ताओं तक एक नई उम्मीद की लहर दिखी। इनेलो ने भी उन्हें साधारण सदस्य नहीं बल्कि राष्ट्रीय संरक्षक का पद देकर यह जताया कि पार्टी उन्हें न केवल सम्मान देती है बल्कि आगामी रणनीति में उनकी भूमिका को केंद्रीय मानती है। उनके पुत्र गौरव सिंह को भी पार्टी ने जिम्मेदारी देने की बात कही जिससे यह संकेत मिलता है कि परिवार का पूरा राजनीतिक अनुभव संगठन को मजबूती देगा। संपत सिंह ने अपने भाषण में साफ कहा कि वे भाजपा के विकल्प के रूप में इनेलो को मजबूत बनाना चाहते हैं और यह उनका मिशन रहेगा कि जनता को फिर से उस विचारधारा के साथ जोड़ा जाए जो चौधरी देवीलाल के समय में गांव-गांव तक पहुंची थी।

इस घटनाक्रम के राजनीतिक मायने कई स्तरों पर समझे जा सकते हैं। सबसे पहले तो यह कांग्रेस के लिए एक झटका है। जिस पार्टी ने अपने पुराने अनुभवी नेताओं को बार-बार हाशिये पर रखा, वहां से इस तरह का पलायन बताता है कि संगठनात्मक असंतोष गंभीर हो चुका है। हरियाणा में पहले ही कांग्रेस आपसी खींचतान और नेतृत्व विवाद से जूझ रही है और ऐसे में संपत सिंह जैसे अनुभवी नेता का जाना उस भरोसे को कमजोर करता है जिसे पार्टी कार्यकर्ता अपनी निष्ठा के रूप में देखता है। यह कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का समय है कि आखिर क्यों उसके वरिष्ठ लोग पार्टी छोड़ने को विवश हो रहे हैं।

दूसरी ओर इनेलो के लिए यह संजीवनी समान है। चौटाला परिवार के नेतृत्व में इनेलो बीते वर्षों में कमजोर पड़ी थी। एक समय था जब यह पार्टी राज्य की सत्ता में थी और हरियाणा के गांव-गांव में उसकी पकड़ थी लेकिन जजपा के गठन और लगातार चुनावी हार ने उसके आत्मविश्वास को झटका दिया। अब जब संपत सिंह जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता पार्टी में लौटे हैं तो यह संकेत है कि इनेलो अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि वह नए सिरे से विपक्ष को मजबूत करने का मन बना चुकी है। अभय चौटाला के लिए यह अवसर है कि वे पुराने साथियों को वापस जोड़कर संगठन का विस्तार करें और लोगों के बीच यह संदेश दें कि इनेलो ही वह विकल्प है जो भाजपा की नीतियों का वास्तविक मुकाबला कर सकती है।

राजनीतिक दृष्टि से यह कदम भाजपा के लिए भी एक चेतावनी है। हरियाणा की सियासत में भाजपा इस समय सत्ताधारी है, लेकिन उसके खिलाफ ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष धीरे-धीरे बढ़ रहा है। किसान आंदोलन के समय से लेकर बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों ने राज्य के मतदाता को असमंजस की स्थिति में रखा हुआ है। ऐसे में यदि इनेलो अपने पुराने जनाधार को पुनः सक्रिय कर सके और कांग्रेस की कमजोरियों का लाभ उठा सके तो आगामी विधानसभा चुनाव में वह तीसरी ताकत के बजाय वास्तविक विपक्ष बन सकती है।

संपत सिंह की वापसी में एक और पहलू है — यह कदम हरियाणा की राजनीति में विचारधारा के सवाल को फिर जीवित करता है। जहां आज दल-परिवर्तन को सामान्य राजनीतिक रणनीति मान लिया गया है, वहीं संपत सिंह ने इसे “घर वापसी” कहा है। इसका मतलब यह है कि वे इसे विचार और संस्कार की ओर लौटना मानते हैं। उन्होंने कहा कि जब विचारधारा दम तोड़ देती है, तब संगठन केवल नाम मात्र का रह जाता है और जब विचार के प्रति निष्ठा होती है, तब ही जनता का विश्वास लौटता है। यह बात इस दौर में खास मायने रखती है जब अधिकतर नेता सिर्फ सत्ता के समीकरण के हिसाब से दल चुनते हैं।

हालांकि आलोचनाएँ भी कम नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं कि अगर उन्हें परिवारवाद से समस्या थी तो इनेलो भी किसी परिवार के नेतृत्व में चलती है। ऐसे में यह विरोधाभास है कि उन्होंने एक परिवार से निकलकर दूसरे परिवार वाली पार्टी में प्रवेश किया। लेकिन इसके जवाब में समर्थकों का तर्क है कि इनेलो में वरिष्ठ नेताओं का सम्मान और विचार विमर्श का माहौल है, जबकि कांग्रेस में केवल कुछ गिने-चुने लोगों के इर्द-गिर्द निर्णय केंद्रित हो गए थे। दूसरी आलोचना यह भी है कि संपत सिंह पहले भी कई बार दल बदल चुके हैं, इसलिए जनता यह सवाल उठा सकती है कि यह विचारधारा की निष्ठा है या अवसर की तलाश। मगर राजनीति में समय-समय पर बदलाव को परिस्थितियों के अनुसार निर्णय माना जाता है और यदि कोई नेता जनता की भलाई और क्षेत्र के विकास के लिए काम करता है तो उसकी नीयत पर प्रश्न नहीं उठाया जाना चाहिए।

अब सवाल यह है कि इस बदलाव से हरियाणा की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा। निकट भविष्य में यह परिवर्तन कांग्रेस के लिए बड़ा संगठनात्मक झटका साबित हो सकता है। प्रदेश में पहले से ही अंदरूनी गुटबाज़ी है, भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी सैलजा जैसे वरिष्ठ नेताओं के बीच संतुलन बनाना पार्टी के लिए मुश्किल रहा है। ऐसे में संपत सिंह जैसे अनुभवी और ज़मीनी नेता का जाना कांग्रेस के ग्रामीण वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं इनेलो के लिए यह मनोबल बढ़ाने वाला क्षण है। पार्टी के कार्यकर्ताओं को अब लगता है कि पुराना गौरव वापस लाया जा सकता है और संगठन में वरिष्ठ नेताओं का अनुभव नए जोश के साथ मिलकर एक नई दिशा देगा।

इनेलो यदि इस अवसर का सही उपयोग करे तो वह विपक्ष के खेमे को पुनः संगठित कर सकती है। इसके लिए उसे सिर्फ पुराने चेहरे लाने से अधिक करना होगा — उसे युवाओं, किसानों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों और महिलाओं से जुड़े मुद्दों को पुनः केंद्र में लाना होगा। संपत सिंह जैसे नेता, जिनकी जड़ें गांवों में गहरी हैं, यदि इन वर्गों से संवाद कायम कर सकें तो पार्टी को फिर से वैचारिक ताकत मिल सकती है। उन्होंने खुद कहा है कि अब राजनीति जनहित और सेवा की दिशा में होनी चाहिए, सिर्फ सत्ता प्राप्ति तक सीमित नहीं। यह कथन बताता है कि वे केवल चुनावी जीत की नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन की सोच के साथ लौटे हैं।

जहां तक भाजपा का सवाल है, वह इस परिवर्तन को हल्के में नहीं लेगी। भाजपा को पता है कि हरियाणा में उसकी जीत बहुमत से अधिक गठबंधन की मजबूती पर आधारित रही है। यदि विपक्ष एकजुट होता है और इनेलो जैसी पार्टी ग्रामीण इलाकों में पैठ बना लेती है तो उसे नुकसान झेलना पड़ सकता है। कांग्रेस के लिए यह सबक है कि संगठन में लोकतांत्रिक संस्कृति बनाए रखना आवश्यक है, अन्यथा असंतोष बढ़ेगा और वरिष्ठ नेता पलायन करेंगे।

हरियाणा की राजनीति हमेशा से नेतृत्व-केन्द्रित रही है। यहां नेता की व्यक्तिगत साख और क्षेत्रीय पकड़ पार्टी से बड़ी मानी जाती है। ऐसे में संपत सिंह जैसे नेताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे नालवा और भट्टू क्षेत्र में मजबूत प्रभाव रखते हैं और उनके समर्थकों का नेटवर्क गांव-गांव में फैला है। अगर वे सक्रिय रहकर जनता से जुड़ाव बनाए रखते हैं तो इनेलो को स्थानीय स्तर पर लाभ मिलेगा। साथ ही, उनका अनुभव और प्रशासनिक समझ पार्टी की नीति निर्माण प्रक्रिया को भी सुदृढ़ करेगा।

हालांकि उनके सामने चुनौतियाँ भी हैं। राजनीति में वापसी का अर्थ केवल पद ग्रहण करना नहीं होता बल्कि जनता के बीच फिर से वही विश्वास कायम करना होता है जो किसी समय था। उन्हें यह दिखाना होगा कि यह वापसी सिर्फ औपचारिक नहीं बल्कि वास्तविक सेवा की भावना से प्रेरित है। कार्यकर्ताओं को प्रेरित करना, नई टीम तैयार करना, चुनावी रणनीति बनाना और पार्टी के अंदर उत्साह बनाए रखना आसान नहीं है लेकिन संपत सिंह जैसे नेता के लिए यह असंभव भी नहीं।

अगर इनेलो इस मौके का सही उपयोग करती है और विपक्षी एकता के लिए पहल करती है तो आने वाले चुनावों में समीकरण बदल सकते हैं। कांग्रेस की कमजोरी और भाजपा के खिलाफ जन असंतोष की पृष्ठभूमि में यह वापसी उस रिक्त स्थान को भर सकती है जो विपक्षी राजनीति में बना हुआ है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि प्रोफेसर संपत सिंह की कांग्रेस छोड़कर इनेलो में वापसी केवल एक व्यक्ति का राजनीतिक निर्णय नहीं है बल्कि हरियाणा की राजनीति में संभावित बदलाव का प्रारंभिक संकेत है। यह एक ऐसी कहानी है जिसमें अनुभव, विचार और अवसर तीनों का संगम दिखाई देता है। अब यह आने वाला समय बताएगा कि यह घर वापसी इनेलो को कितना मजबूत करती है और जनता इसे किस दृष्टि से देखती है। यदि संपत सिंह अपने मिशन में सफल रहते हैं और पार्टी को नई दिशा देते हैं तो यह कदम हरियाणा की राजनीति का निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। लेकिन यदि यह केवल प्रतीकात्मक परिवर्तन रह गया तो यह इतिहास में एक और राजनीतिक पलायन की घटना बनकर रह जाएगा। फिलहाल इतना तय है कि इस निर्णय ने हरियाणा की सियासत में हलचल जरूर मचा दी है और आने वाले चुनावों में इसका असर दूर-दूर तक महसूस किया जाएगा।

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