तिलक चंद रमोला नौगांव: आठ गांवों के ईष्टदेव भदेश्वर देवता की वार्षिक जातर को लेकर नौगांव गांव में आस्था और उल्लास का माहौल रहा। इस मौके पर रवांई लोक संस्कृति की धूम रही। स्थानीय वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच पारंपरिक परिधानों और आभूषणों से सजी महिलाओं ने भद्रेश्वर देवता का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया। ग्रामीणों ने देवता की पूजा-अर्चना कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की।
एक वर्ष तक देवलसारी थान स्थित गर्भगृह में विराजमान रहने के बाद भद्रेश्वर देवता भादों मास की 15 गते को अपने गर्भगृह से बाहर निकलते हैं। मुंगरा गांव से देव भ्रमण शुरू करने के बाद भदेश्वर देवता नौगांव गांव पहुंचे। यहां श्रद्धालुओं ने देवता के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। इसके बाद बुधवार शाम भदेश्वर देवता मुलाना गांव पहुंच गए।
नौगांव में भदेश्वर देवता की पूजा-अर्चना विशालमणि नौटियाल की ओर से की गई तथा उन्होनें अवतरित होकर सबको अपना आशीष दिया।
इस दौरान ढोल-दमाऊं और स्थानीय वाद्य यंत्रों की थाप पर ग्रामीणों ने देवता का स्वागत किया। गांव में पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के साथ रवांई की समृद्ध लोक संस्कृति की शानदार झलक देखने को मिली।
लोकमान्यता है कि भदेश्वर देवता स्वयंभू हैं। देवलसारी गांव स्थित प्राचीन दिव्य शिवालय में भगवान शिव एक पत्थर के रूप में स्वयं प्रकट हुए थे। तभी से देवलसारी के पंडित परिवार की ओर से विधि-विधान के साथ भद्रेश्वर देवता की पूजा-अर्चना की जाती है।
भदेश्वर देवता की देव यात्रा मुंगरा, नौगांव, मुलाना, धारी, मुराड़ी, तुनाल्का और सौली गांव से होते हुए नौगांव बाजार स्थित शिव मंदिर तक पहुंचती है। प्रत्येक गांव में ग्रामीण पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ देवता का स्वागत करते हैं।
रुद्रेश्वर और भदेश्वर को माना जाता है भाई
पुजारी अनूप नौटियाल ने बताया कि लोकमान्यता के अनुसार रुद्रेश्वर महादेव और भदेश्वर देवता को आपस में भाई माना जाता है। दोनों देवताओं के प्रति रवांई क्षेत्र में श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। देव भ्रमण पूरा करने के बाद भदेश्वर देवता पुनः देवलसारी थान स्थित गर्भगृह में लौटकर एक वर्ष तक विराजमान रहते हैं।
इस मौके पर नगर पंचायत अध्यक्ष विजय कुमार, मायाराम, सभासद रीना चुनार, सोबेन्द्र सिंह, मातबर, नरेश, अर्जुन, अजब सिंह, आशीष रावत, रणवीर रावत, धर्म सिंह राणा, जयवीर, अर्जुन सिंह, अमीर, हरिमोहन, चंद्रमोहन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
भदेश्वर देवता की यह वार्षिक जातर धार्मिक आस्था के साथ-साथ रवांई की लोक संस्कृति, देव परंपरा और सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है।

