
✍️ संपादक : कोमल रमोला
दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया विदेश दौरा एशियाई राजनीति, आर्थिक सहयोग और सामरिक संतुलन के लिहाज़ से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस यात्रा ने न केवल भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को और मजबूत किया, बल्कि एशिया की तीन बड़ी शक्तियों—जापान, चीन और रूस—के साथ रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित भी किया। यह संयोग ही है कि ऐसे समय में जब वैश्विक राजनीति उथल-पुथल से गुजर रही है, जब अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता नई ऊँचाइयों पर पहुँच रही है, रूस पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और एशियाई देशों में नए गठबंधन बनने की प्रक्रिया तेज़ हो रही है, भारत ने खुद को केंद्र में स्थापित करने की कोशिश की। मोदी का यह दौरा इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
दौरे की शुरुआत जापान से हुई। जापान और भारत के रिश्ते हमेशा से भरोसे और साझा हितों पर टिके रहे हैं। टोक्यो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के बीच हुई वार्ता में मुख्य जोर आर्थिक सहयोग और तकनीकी साझेदारी पर था। जापान पहले से ही भारत में सबसे बड़ा निवेशक है और उसकी कंपनियाँ विशेष आर्थिक क्षेत्रों से लेकर बुनियादी ढाँचे तक में गहरी रुचि लेती रही हैं। इस मुलाकात में दोनों नेताओं ने रक्षा और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई, विशेष रूप से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों के मद्देनज़र। जापान ने भारत में रेलवे, स्मार्ट सिटी और डिजिटल टेक्नोलॉजी में भारी निवेश का वादा किया। यह निवेश न केवल भारत की विकास दर को तेज़ करेगा बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ जैसी योजनाओं को गति भी देगा। वहीं, सांस्कृतिक स्तर पर भी दोनों देशों ने रिश्तों को और मजबूत करने पर बल दिया। बौद्ध धर्म की साझा विरासत और युवा आदान-प्रदान कार्यक्रमों के माध्यम से दोनों देशों ने यह स्पष्ट किया कि सहयोग केवल आर्थिक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी इसकी गहराई बढ़ेगी।
जापान के बाद मोदी की यात्रा का अगला पड़ाव चीन था, जहाँ तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का 25वाँ शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। चीन और भारत के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों से तनावपूर्ण रहे हैं, विशेषकर सीमा विवाद के कारण। लेकिन यह यात्रा रिश्तों को सुधारने का एक अहम प्रयास थी। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बातचीत में दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि सीमा विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाना चाहिए और व्यापार को विवादों से अलग रखकर आगे बढ़ाना चाहिए। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी, क्योंकि दोनों देश एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ हैं और यदि उनके बीच भरोसे का रिश्ता बने तो न केवल एशिया बल्कि पूरे विश्व की राजनीति प्रभावित होती है।
इस मुलाकात में व्यापारिक संतुलन एक बड़ा मुद्दा रहा। भारत लंबे समय से चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे से चिंतित है। मोदी ने इस पर स्पष्ट रूप से चीन का ध्यान आकर्षित किया और मांग की कि भारतीय निर्यात पर लगे अनावश्यक प्रतिबंधों को हटाया जाए। दूसरी ओर, चीन ने संकेत दिया कि वह इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाएगा। इसके अलावा, दोनों देशों ने कैलाश मानसरोवर यात्रा को पुनः शुरू करने और सीधी हवाई सेवाओं को बहाल करने पर भी चर्चा की। यह निर्णय सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है बल्कि दोनों देशों के नागरिकों के बीच सीधा संवाद भी बढ़ाएगा।
एससीओ शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी रणनीति स्पष्ट करते हुए कहा कि संगठन की मजबूती सुरक्षा, अवसर और कनेक्टिविटी पर निर्भर करती है। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति दोहराई और कहा कि किसी भी प्रकार का कट्टरपंथ या हिंसा विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा है। मोदी के इस रुख को न केवल रूस और मध्य एशियाई देशों का समर्थन मिला बल्कि चीन ने भी इसे सकारात्मक दृष्टि से लिया। इस तरह भारत ने एक बार फिर यह साबित किया कि वह क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर संतुलित और जिम्मेदार नेतृत्व दे सकता है।
चीन के बाद मोदी की सबसे महत्वपूर्ण मुलाकात रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से हुई। रूस और भारत के रिश्ते दशकों पुराने हैं और रक्षा, ऊर्जा तथा रणनीतिक मामलों में दोनों की गहरी साझेदारी रही है। मौजूदा समय में, जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए हुए हैं और अमेरिका ने रूसी तेल पर भारी शुल्क लगाया है, तब भारत और रूस का करीब आना दोनों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रहा है। मोदी और पुतिन की मुलाकात में ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ा विषय रहा। रूस ने भारत को दीर्घकालिक तेल और गैस आपूर्ति सुनिश्चित करने का भरोसा दिया। इससे भारत की ऊर्जा ज़रूरतें पूरी होंगी और वैश्विक बाज़ार में अस्थिरता का उस पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।
इसके साथ ही, दोनों नेताओं ने रक्षा सहयोग पर भी चर्चा की। भारत पहले से ही रूस से हथियारों और रक्षा तकनीक का सबसे बड़ा खरीदार है। अब दोनों देश संयुक्त उत्पादन और तकनीकी हस्तांतरण पर भी काम करने को तैयार हैं। इससे भारत की रक्षा क्षमता मजबूत होगी और ‘मेक इन इंडिया’ के तहत स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा, पुतिन और मोदी ने हीरा व्यापार, एयरोस्पेस और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स पर सहयोग बढ़ाने की भी बात की। यह सहयोग केवल आर्थिक नहीं बल्कि व्यावहारिक दृष्टि से भी अहम है क्योंकि यह भारत को वैश्विक तकनीकी विकास में हिस्सेदार बनाएगा।
अगर इस पूरी यात्रा के समग्र प्रभाव की बात की जाए तो स्पष्ट है कि भारत ने एक साथ तीन बड़ी ताकतों से अपने रिश्ते मजबूत किए। जापान से आर्थिक और तकनीकी सहयोग, चीन से व्यापार और सांस्कृतिक समझौतों में सुधार और रूस से ऊर्जा व रक्षा साझेदारी—ये तीनों स्तंभ भारत की विदेश नीति को नई ऊँचाई देते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि इन रिश्तों का असर केवल द्विपक्षीय नहीं होगा बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी गहरा पड़ेगा।
आर्थिक दृष्टि से देखें तो जापान के निवेश और चीन के बाज़ार तक पहुँच भारत की विकास दर को गति देंगे। रूस से ऊर्जा आपूर्ति सस्ती और स्थिर रहेगी, जिससे उद्योगों को लाभ मिलेगा और आम जनता पर बढ़ती तेल कीमतों का बोझ नहीं पड़ेगा। सामाजिक दृष्टि से, भारत-चीन के बीच यात्राओं का पुनः शुरू होना और जापान के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम लोगों को एक-दूसरे के और करीब लाएंगे। व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो तीनों देशों के साथ सहयोग भारत को वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाएगा।
रक्षा और सुरक्षा के मोर्चे पर भी इस यात्रा के बड़े नतीजे सामने आए। जापान के साथ इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सामरिक साझेदारी, रूस के साथ संयुक्त रक्षा उत्पादन और चीन के साथ सीमा विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की सहमति—ये सभी ऐसे कदम हैं जो भारत को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करेंगे।
हालाँकि चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। चीन के साथ भरोसे की खाई अभी पूरी तरह पाटी नहीं जा सकी है और सीमा विवाद समय-समय पर तनाव पैदा कर सकता है। जापान के साथ सहयोग में चीन की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी क्योंकि इंडो-पैसिफिक में त्रिकोणीय शक्ति संतुलन का खेल चल रहा है। रूस के साथ गहरे संबंध अमेरिका और यूरोप को असहज कर सकते हैं, जिससे कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है।
फिर भी, इन सभी संभावित चुनौतियों के बावजूद यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा भारत की विदेश नीति का एक मील का पत्थर है। भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह न तो किसी गुट का अंधानुकरण करेगा और न ही खुद को अलग-थलग रहने देगा। वह अपनी शर्तों पर, अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर, सभी शक्तियों के साथ साझेदारी करेगा। यही संतुलन भारत को आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति का निर्णायक खिलाड़ी बनाएगा।
निष्कर्षतः, मोदी का जापान, चीन और रूस का यह दौरा केवल औपचारिकता नहीं बल्कि भारत की नई विदेश नीति की रूपरेखा है। इसमें आर्थिक लाभ, सामाजिक जुड़ाव, व्यावहारिक सहयोग और रक्षा साझेदारी का वह मिश्रण है जो किसी भी देश को सशक्त बनाता है। यह यात्रा बताती है कि भारत अब केवल एशिया में ही नहीं बल्कि वैश्विक मंच पर भी निर्णायक भूमिका निभाने को तैयार है।

