संकट की घड़ी में हरियाणा सरकार की पहल: मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी
पड़ोसी राज्यों के लिए संवेदना और सहयोग का जज्बा
चंडीगढ़ : भारत एक ऐसा देश है जिसकी सामाजिक और राजनीतिक संस्कृति में “संकट की घड़ी में साथ निभाना” सबसे बड़ा मूल्य रहा है। जब कहीं प्राकृतिक आपदा आती है तो सीमाएं और सरहदें पीछे छूट जाती हैं, और मानवता सबसे आगे खड़ी हो जाती है। हाल ही में उत्तर भारत के कई राज्यों—जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हिमाचल प्रदेश—को लगातार भारी बारिश और बाढ़ का सामना करना पड़ा। पहाड़ों से लेकर मैदानों तक जल भराव ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया। इस कठिन परिस्थिति में हरियाणा सरकार ने जो कदम उठाए, उसने न केवल प्रदेश की जिम्मेदारी दिखाई बल्कि पड़ोसी धर्म निभाने की परंपरा को भी मजबूत किया।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने स्पष्ट कहा कि “संकट की घड़ी में हरियाणा सरकार जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है।” यह केवल शब्द नहीं, बल्कि उन निर्णयों से भी प्रमाणित हुआ है, जिनके जरिए हरियाणा ने पड़ोसी राज्यों को मदद भेजकर मानवीय संवेदनाओं को सर्वोपरि रखा।
जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हिमाचल को राहत
कुछ ही दिनों पहले हरियाणा सरकार ने जम्मू-कश्मीर और पंजाब में बाढ़ पीड़ितों के लिए 5-5 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता भेजी थी। यह कदम तब उठाया गया जब वहां के कई जिलों में बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं ने हजारों परिवारों को बेघर कर दिया।
इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए अब हिमाचल प्रदेश को भी 5 करोड़ रुपये की सहायता राशि भेजी गई है। हिमाचल में पिछले हफ्ते लगातार बारिश ने सैकड़ों घरों को नुकसान पहुंचाया, सड़कें टूट गईं, बिजली-पानी की आपूर्ति बाधित हो गई और पर्यटकों समेत स्थानीय लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ा। ऐसे में हरियाणा की ओर से भेजी गई यह मदद वहां के लोगों के लिए जीवनदायी साबित होगी।
मुख्यमंत्री राहत कोष में योगदान की अपील
मुख्यमंत्री सैनी ने कैबिनेट की अनौपचारिक बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में बताया कि सभी मंत्री, पार्टी विधायक और समर्थित विधायक अपना एक माह का वेतन मुख्यमंत्री राहत कोष में देंगे। यह राशि सीधे बचाव और पुनर्वास कार्यों में इस्तेमाल की जाएगी ताकि प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत मिल सके।
सिर्फ नेताओं तक ही यह अपील सीमित नहीं रही। मुख्यमंत्री ने प्रदेश के अधिकारियों और कर्मचारियों से भी कहा कि वे अपनी इच्छा अनुसार मुख्यमंत्री राहत कोष में योगदान करें। इतना ही नहीं, उन्होंने सामाजिक संगठनों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों से भी मदद की अपील की। यह कदम हरियाणा सरकार के व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें सरकारी तंत्र के साथ-साथ समाज के हर वर्ग को राहत कार्यों में शामिल करने की मंशा है।
राहत कोष सभी के लिए खुला
पत्रकारों ने जब विपक्षी दलों से सहयोग की संभावना पर प्रश्न किया तो मुख्यमंत्री ने कहा कि मुख्यमंत्री राहत कोष सभी के लिए खुला है। कोई भी व्यक्ति, संगठन या संस्था अपनी इच्छा से योगदान कर सकता है। यह बयान राजनीति से ऊपर उठकर दिया गया संदेश था कि आपदा की घड़ी में पार्टी नहीं, बल्कि इंसानियत बड़ी होती है।
पंजाब के साथ पड़ोसी धर्म
हरियाणा और पंजाब का रिश्ता ऐतिहासिक और भावनात्मक है। हाल ही में जब पंजाब में बाढ़ ने तबाही मचाई, तब हरियाणा सरकार ने तुरंत मदद का हाथ बढ़ाया। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने स्वयं पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से मुलाकात की, उनका हालचाल लिया और आपदा से जुड़े हालात की जानकारी प्राप्त की।
उन्होंने स्पष्ट कहा—“पड़ोसी धर्म निभाना हमारा दायित्व है। पंजाब हमारा भाई है और हरियाणा सरकार पूरी तरह से पंजाब के साथ खड़ी है।”
यह वक्तव्य केवल राजनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक सच्ची भावना का परिचायक था।
प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका और विपक्ष पर कटाक्ष
आपदा की राजनीति भी भारतीय लोकतंत्र की एक वास्तविकता है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि विपक्षी दलों के नेता अब बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं, जबकि पहले वे सिर्फ ट्वीट तक सीमित रहते थे।
कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि जब भी देश पर कोई विपत्ति आती है, कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व विदेश चला जाता है। इसके उलट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार अपने कार्यक्रम रद्द करके सीधे जनता के बीच पहुंचते हैं। सैनी ने मोदी को ऐसे पहले प्रधानमंत्री बताया जो संकट की घड़ी में जनता के बीच खड़े रहते हैं और दिल से कही गई बात को समय पर पूरा भी करते हैं।
किसानों की फसल क्षति और ई-क्षतिपूर्ति पोर्टल
बाढ़ और बारिश का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ता है। खेतों में लगी फसलें पानी में डूब जाती हैं और महीनों की मेहनत बर्बाद हो जाती है। इस संदर्भ में मुख्यमंत्री ने बताया कि ई-क्षतिपूर्ति पोर्टल पर किसानों का पंजीकरण तेजी से हो रहा है।
उन्होंने कहा कि सरकार स्वयं फील्ड में जाकर स्थिति का आकलन कर रही है। एक माह पूर्व ही किसानों को 88.50 करोड़ रुपये का मुआवजा जारी किया गया था। यह पारदर्शी और त्वरित राहत देने का तंत्र है, जिससे किसानों का विश्वास सरकार पर बना रहे।
संकट में राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका
इतिहास गवाह है कि जब भी देश या प्रदेश पर आपदा आई है, जनता की नजर सबसे पहले राजनीतिक नेतृत्व पर जाती है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का फील्ड में जाकर जनता से संवाद करना, प्रभावित इलाकों का दौरा करना और राहत कार्यों की समीक्षा करना इस बात का प्रतीक है कि सरकार सिर्फ आदेश देने तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर सक्रिय भी है।
इससे जनता को यह भरोसा मिलता है कि उनका नेतृत्व उनके साथ खड़ा है। यही भरोसा किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी होता है।
सामाजिक और औद्योगिक सहयोग की आवश्यकता
हरियाणा एक औद्योगिक और कृषि प्रधान राज्य है। यहां बड़ी संख्या में सामाजिक संस्थाएं, उद्योग और कारोबारी घराने कार्यरत हैं। सरकार ने जब इन संस्थाओं से योगदान की अपील की तो इसका एक व्यापक संदेश गया—आपदा केवल सरकार का विषय नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है।
जब समाज के विभिन्न वर्ग एकजुट होकर मदद करते हैं तो राहत कार्यों की गति कई गुना बढ़ जाती है। यह मॉडल न केवल हरियाणा बल्कि पूरे देश के लिए अनुकरणीय हो सकता है।
हरियाणा की संवेदनशीलता: राजनीति से ऊपर इंसानियत
हरियाणा सरकार की यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल “अपना प्रदेश बचाना” नहीं, बल्कि “पड़ोसी की पीड़ा में साझेदार बनना” है। जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हिमाचल को आर्थिक मदद भेजना एक ऐसा कदम है जिसने यह संदेश दिया कि संवेदनशीलता और इंसानियत राजनीति से कहीं ऊपर है।
आज जब राजनीति अक्सर आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित दिखती है, तब हरियाणा सरकार का यह रुख लोकतंत्र की परिपक्वता को उजागर करता है।
मीडिया और जनसंपर्क की भूमिका
इस पूरी प्रक्रिया में सूचना, जनसंपर्क, भाषा एवं संस्कृति विभाग की भूमिका भी उल्लेखनीय रही। विभाग के महानिदेशक के. मकरंद पांडुरंग और मुख्यमंत्री के ओएसडी भारत भूषण भारती इस दौरान मौजूद रहे। यह दिखाता है कि सरकार ने मीडिया के जरिए जनता तक सही और पारदर्शी जानकारी पहुंचाने का प्रयास किया
हरियाणा सरकार द्वारा उठाए गए कदम यह साबित करते हैं कि संकट की घड़ी में पड़ोसी राज्य ही नहीं, बल्कि पूरा देश एकजुट हो सकता है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का नेतृत्व इस बात का परिचायक है कि जब राजनीतिक इच्छाशक्ति और मानवीय संवेदना मिल जाती है, तो किसी भी आपदा का सामना करना आसान हो जाता है।
यह आर्टिकल हमें यह सोचने पर भी मजबूर करता है कि क्या हम, एक आम नागरिक के रूप में, ऐसी परिस्थितियों में योगदान के लिए तैयार हैं? सरकार तो अपनी जिम्मेदारी निभा रही है, लेकिन राहत कोष हर नागरिक के लिए खुला है। जब समाज और सरकार मिलकर आगे बढ़ते हैं, तभी सच्चा लोकतंत्र और मानवीय मूल्यों की स्थापना होती है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम सब मिलकर इस संदेश को आत्मसात करें—“आपदा में एक-दूसरे का साथ देना ही असली पड़ोसी धर्म है।

