रिपोर्ट: प्रीति कंबोज
नई दिल्ली : प्रकृति की अनंत गहराईयों में डूबने के लिए हिमालय की गोद में जाने से बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता। कल-कल कर बहते झरने, नदियां, पहाड़ व गहरे हरे रंग में सराबोर हरियाली बरबस अपनी तरफ खींच लेती है। ललित कला अकादमी में प्रतिभा अवस्थी अपनी पेंटिंग प्रदर्शनी में इन दिनों हिमालय के इन्हीं
रंगों से रूबरू करा रही हैं। कला प्रेमी उनकी पेंटिंग की गहराईयों में डुबकी लगाते हुए हिमालय की खूबसूरती वादियों व उनमें बसे प्रकृति के चमत्कारों से रूबरू हो रहे हैं। हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों के आगोश में बसे भारत के बेहद खूबसूरत हिस्से उत्तरपूर्व भारत के मेघालय में प्रकृत के एक ऐसे ही चमत्कार जीवित जड़ सेतु (Living Root Bridge) को कैनवास में एक कलाकार की नजर में उतारकर सुदूर भारत के एक हिस्से से निकाल इन्हें
देश की राजधानी दिल्ली में प्रतिभा अवस्थी कला प्रेमियों से रूबरू करवा रही हैं।
नई दिल्ली में मंडी हाउस स्थित ललित कला अकादमी में 12 अक्टूबर को दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने ‘बियोन्ड दवर्ड’ यानि शब्दों से परे शीर्षक के तहत लगी प्रतिभा अवस्थी की इस पेंटिंग प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था। 18 अक्टूबर तक चलने वाली इस प्रदर्शनी के शीर्षक को सार्थक करते हुए प्रतिभा ने जिस तरह अपनी पेंटिंग में रंगों का संयोजन प्रस्तुत किया है वह कला प्रेमियों को बरबस हिमालय की वादियों में लेकर चला जाता है। प्रतिभा की पेंटिंग कला प्रेमियों को प्रकृति के उस पहलू से रूबरू कराती है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं है। गहरे हरे रंग के इस्तेमाल के साथ ही वर्ष के विविध मौसम में बदलते प्रकृति के रूपों को बखूबी जिस तरह प्रतिभा ने अपनी पेंटिंग में दिखाया है वह कला प्रेमियों को ठहरकर देखने के लिए मजबूर कर देता है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय कहते हैं कि प्रतिभा के सभी चित्र प्रकृति से प्रेरित प्रतीत होते हैं। ये हरे रंग की प्रधानता लिए हुए हैं। चित्रकार की कल्पना रंग और ब्रश के संयोजन से जीवंत हो गई है। हरियाणा विधानसभा के सलाहकार राम नारायण यादव लिखते हैं कि प्रतिभा अवस्थी के चित्र संपूर्ण प्रकृति की भव्यता को दर्शाते हैं।
सीनियर आर्टिस्ट अखिलेश निगम लिखते हैं कि सौंदर्यबोध कलाकार की अंर्तदृष्टि है। यह दृष्टि ही उसे फलक पर रूप गढ़ने का मन देती है। प्रतिभा की प्रदर्शित कृतियां इसका प्रमाण हैं। देश के फलक पर कला के क्षेत्र में बड़े नाम दिल्ली के तमाम सीनियर आर्टिस्ट ने प्रतिभा की कलाकृतियों को लेकर कुछ इसी तरह की राय व्यक्त की है। कला के क्षेत्र में
दिल्ली के एक बड़े नाम राजेश शर्मा कहते हैं कि मैं प्रतिभा को पिछले कई वर्षों से जानता हूं। वह कठिन परिश्रम के साथ काफी अच्छा काम कर रही हैं।विशेषतौर पर प्रकृति पर। दिल्ली में ललित कला अकादमी के गढी़ स्थित आर्टिस्ट स्टूडियो में लंबे समय से जीवित जड़ सेतु पर आधारित अपनी श्रंखला पर कार्य कर रही प्रतिभा अवस्थी ने भारत की इस अनमोल धरोहर को बड़ी खूबसूरती से कैनवास पर उतारा है।

प्रकृति के प्रति गहरी समझ
प्रतिभा अवस्थी द्वारा किए गए विषय के चयन से भी यह बात जाहिर होती है कि प्रकृति को लेकर उनकी समझ व कैनवस पर उसे आकार देने में अन्य कलाकारों से वह किस तरह बिल्कुल अलग हैं। उनकी कला में गहरी संवेदनशीलता की
अभिव्यक्ति जिस तरह से होती है वह भी इस बात का प्रमाण है कि परंपरा से हटकर वह सोंचती हैं। हिमालय की गोद में बसे जम्मू-कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर पूर्व भारत के असम व मेघालय जैसे बेमिसाल
प्राकृतिक खूबसूरती को समेटे राज्यों की उनकी यात्रा व निवास प्रकृति की गहरी समझ को विकसित करने में सहायक हुआ। यहीं से कुछ ऐसा करने की उन्हें प्रेरणा मिली, जिसे कैनवास के जरिये एक नया आयाम दिया जा सके। इसी यात्रा
में प्रकृति की अद्भुद सौगात माने जाते मेघालय के जीवित जड़ सेतु को एक कलाकार की नजर में कैनवास में उतारकर एक साधक की तरह जीने की कोशिश प्रतिभा अवस्थी ने की है।
प्रकृति के चमत्कार को बनाया कैनवास का हिस्सा
मेघालय के जीवित जड़ सेतु प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर होने के साथ ही जनजातीय जीवन के संघर्ष की भी मिसाल हैं। मेघालय में निवास करने वाली खासी और जयंतिया जनजातियां इनका निर्माण करती हैं। यह उनकी जीवनरेखा की
तरह हैं। पहाड़ी नदी-नाले पार करने का जरिया ये जीवित जड़ सेतु इन जनजातियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर भी हैं। साथ ही ये जनजातीय वास्तुकला का भी बेहतरीन नमूना हैं। बावजूद इसके किन्हीं वजहों से यह अनमोल धरोहर विलुप्त हो रही है। 500 साल तक पुराने इन सेतु को बनाने में खासी और जयंतिया जनजातियों को 50 से 60 साल या इससे भी ज्यादा का समय लग जाता है। जीवित जड़ सेतु को कैनवास पर उतारने के लिए ये तमाम खूबियां व उनकी संवेदनशीलता प्रतिभा को उस मुकाम पर ले गईं कि उन्होंने अंततः इस
श्रंखला पर काम करने का फैसला किया।
अनजान दुनिया को रूबरू कराने की चाहत
हिमालयी क्षेत्र की अपनी यात्रा में प्रतिभा को यह देख कर भी आश्चर्य हुआ कि प्रकृति की इतनी खूबसूरत सौगात से अधिकतर दुनिया अभी तक अनजान है।
अपने पारंपरिक ज्ञान से वृक्षों की जड़ों को जोड़-तोड़ कर इन्हें आकार देने वाली मेघालय में पाई जाने वाली जनजातियों की इस अनमोल धरोहर से
दुनिया को अवगत करवाने के लिए किए गए प्रयास नाकाफी रहे हैं। इन जड़सेतुओं में इस्तेमाल जनजातीय कला के संरक्षण की भी जरूरत है। आमतौर पर जब भी भारत में पर्यटन स्थलों की बात होती है, तो दक्षिण, उत्तर और पूर्व का ही जिक्र ज्यादा आता है। लेकिन इस बीच देश का उत्तर-पूर्व भाग कहीं
छुप सा जाता है। जबकि सच यह है कि देश का यह हिस्सा प्रकृति की अनकही दास्तान की तरह है। लोगों को यह बताने की जरूरत है कि जनजातीय जीवन से भरपूर यह क्षेत्र अपने आप में अप्रतिम सौंदर्य के साथ संस्कृति की अनमोल
विरासत समेटे हुए है। विविधताओं से भरे हमारे देश की संस्कृति, परंपराएं, इतिहास, भूगोल व मूल्य बिना इस क्षेत्र को समाहित किए अधूरे हैं। प्रतिभा ने जिस संवेदनशीलता के साथ इन्हें कैनवास पर उतारा है व दुनिया को एक कलाकार की नजर से प्रकृति के इस चमत्कार से रूबरू करवाने की
कोशिश की है वह अप्रतिम है।

