गौशालाओं  को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास में सहभागी बने आमजन — मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी

 

करनाल की श्रीकृष्ण गौशाला में गोपाष्टमी पर्व पर मुख्यमंत्री का विशेष संबोधन, 21 लाख रुपये की सहायता राशि की घोषणा

रिपोर्ट : प्रीति कंबोज

करनाल, 30 अक्तूबर। गोपाष्टमी के पावन अवसर पर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि गौ माता केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण का आधार हैं। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने के अभियान में प्रत्येक नागरिक सहभागी बने। मुख्यमंत्री करनाल की श्रीकृष्ण गौशाला में आयोजित गोपाष्टमी महोत्सव में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए, जहां उन्होंने गौशाला को अपने ऐच्छिक कोष से 21 लाख रुपये की सहायता देने की घोषणा की।

मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम की शुरुआत गौमाता की पूजा-अर्चना से की। उन्होंने गायों को चारा खिलाया, गौशाला परिसर में बने चिकित्सालय का निरीक्षण किया और वहां उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं का जायजा लिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि गोपाष्टमी केवल पर्व नहीं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति का जीवंत संदेश है जो सेवा, करुणा और कर्तव्य बोध का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि गाय भारतीय समाज की आत्मा है, जिसके बिना जीवन की कल्पना अधूरी है। प्राचीन समय में गाय संपन्नता और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी। उन्होंने पौराणिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि समुद्र मंथन से निकली कामधेनु गाय को देवी-देवताओं ने विशेष स्थान दिया और भगवान श्रीकृष्ण ने जब गोवर्धन पर्वत धारण किया, तब उसी घटना की स्मृति में आज भी गोपाष्टमी मनाई जाती है।

मुख्यमंत्री सैनी ने कहा कि गाय के दूध में अमृत के समान गुण पाए जाते हैं। वैज्ञानिक शोध भी यह प्रमाणित करते हैं कि देसी गाय का दूध अनेक रोगों में लाभदायक होता है और यह मां के दूध जितना ही पौष्टिक है। उन्होंने कहा कि गौमाता के प्रति श्रद्धा केवल भावनात्मक नहीं बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण और आर्थिक दृष्टि से भी उपयोगी है।

उन्होंने बताया कि हरियाणा सरकार ने गौवंश के संरक्षण और गौशालाओं के विकास के लिए अभूतपूर्व कदम उठाए हैं। वर्ष 2014 में जहां केवल 215 पंजीकृत गौशालाएं थीं, वहीं आज राज्य में 686 गौशालाएं कार्यरत हैं जिनमें 4 लाख से अधिक गौवंश संरक्षित है। सरकार ने गौ सेवा आयोग का बजट 2 करोड़ से बढ़ाकर 600 करोड़ रुपये कर दिया है। गौशालाओं को सस्ती बिजली दरें, भूमि रजिस्ट्री पर स्टांप ड्यूटी में छूट, ई-रिक्शा की सुविधा और मोबाइल पशु चिकित्सालय की सेवाएं दी जा रही हैं।

मुख्यमंत्री ने बताया कि 51 गौशालाओं में नए शेड बनाए जा चुके हैं और शेष में निर्माण कार्य जारी है। गायों के चारे के लिए 605 गौशालाओं को 88 करोड़ 50 लाख रुपये का अनुदान दिया गया है, जबकि पिछले 11 वर्षों में 388 करोड़ रुपये से अधिक राशि गौशालाओं के पोषण पर खर्च की गई है। उन्होंने कहा कि देसी नस्ल की गायों के संरक्षण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में “राष्ट्रीय गोकुल मिशन” चलाया जा रहा है, जिसके अंतर्गत नस्ल सुधार और जैविक उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाना है ताकि वे अपने स्तर पर गोबर, गोमूत्र और पंचगव्य से बने उत्पाद जैसे प्राकृतिक फिनाइल, जैविक खाद, दीये, धूप, साबुन, बर्तन और गमले तैयार कर सकें। इसके लिए राज्य सरकार आवश्यक मशीनरी की खरीद में वित्तीय सहायता भी प्रदान कर रही है। उन्होंने बताया कि 101 गौशालाओं को 6 करोड़ 50 लाख रुपये की राशि पंचगव्य उत्पादन के लिए दी गई है।

गौमाता की सुरक्षा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता पर बल देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि गौ हत्या और गौ तस्करी पर सख्त कानून लागू है। गौ हत्या करने वाले को दस वर्ष तक और गौ तस्करी करने वाले को सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि इन कानूनों का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि जन चेतना जागृत करना है ताकि समाज स्वयं गौ रक्षा का दायित्व निभाए।

कार्यक्रम में गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने गोपाष्टमी के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गौमाता सामान्य प्राणी नहीं बल्कि सनातन परंपराओं की आत्मा हैं। जब तक गौ की रक्षा होगी, तब तक धर्म, संस्कृति और जीवन सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य अनुसार गौ पालन या गौ सेवा करनी चाहिए, क्योंकि गौ सेवा से बड़ी कोई सेवा नहीं।

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने अंत में कहा कि गोपाष्टमी का संदेश यही है कि हम सब मिलकर गायों की सेवा, सुरक्षा और संवर्धन के लिए प्रयासरत रहें। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि सड़क पर छोड़ी गई गायों को गौशालाओं तक पहुंचाने में सहयोग करें और गोबर-गौमूत्र आधारित उत्पादों का प्रयोग बढ़ाएं ताकि गौशालाएं आत्मनिर्भर बन सकें और सनातन संस्कृति की यह परंपरा सशक्त रूप में आगे बढ़े।

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