गर्मी की मार, अर्थव्यवस्था पर बढ़ता भार यूरोप की हीटवेव से दुनिया के लिए आर्थिक सबक

:हीना भाटिया

चन्द्र शेखर धरणी

चंडीगढ़: अर्थशास्त्र शिक्षिका, निदेशक, आरंभ कॉमर्स अकादमी (CBSE एवं CUET), व लेखिका हीना भाटिया मानती है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रहा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है।
हीना भाटिया कहती हैं कि हीटवेव को अक्सर मौसम की सामान्य घटना मान लिया जाता है, लेकिन हाल ही में यूरोप में पड़ी भीषण गर्मी ने यह स्पष्ट कर दिया कि अत्यधिक तापमान केवल जनजीवन और पर्यावरण ही नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी गहराई से प्रभावित करता है। यूरोप के अनेक देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास या उससे अधिक पहुँचने पर परिवहन सेवाएँ प्रभावित हुईं, पर्यटन गतिविधियाँ बाधित हुईं, स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ा और सरकारों को आपातकालीन कदम उठाने पड़े। यह स्थिति बताती है कि जलवायु परिवर्तन अब आर्थिक स्थिरता और विकास से सीधे जुड़ा हुआ विषय बन चुका है।
हीना भाटिया कहती हैं कि हाल ही में सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी व्यापक रूप से चर्चा में रही—”यूरोप 40°C पर रुक गया, जबकि भारत में लोग 45°C पर भी चाय पीते हैं।” यह बात भले ही हास्यपूर्ण लगे, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक गंभीर है। प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा देश अधिक गर्मी सह सकता है, बल्कि यह है कि किस देश की अर्थव्यवस्था बदलती जलवायु परिस्थितियों का सामना करने के लिए कितनी तैयार है।
हीना भाटिया कहती हैं कि आर्थिक दृष्टि से प्रत्येक हीटवेव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार की हानि पहुँचाती है। कृषि, निर्माण, परिवहन, विनिर्माण और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिकों की उत्पादकता अत्यधिक गर्मी के कारण घट जाती है। कार्य के घंटे कम होते हैं, उत्पादन प्रभावित होता है और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में व्यवधान आता है। इसका सीधा असर राष्ट्रीय आय, रोजगार और आर्थिक विकास पर दिखाई देता है।
हीना भाटिया कहती हैं कि पर्यटन, जो अनेक यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है, भी इस संकट से प्रभावित हुआ है। भीषण गर्मी के कारण पर्यटक अपनी यात्रा योजनाओं में बदलाव कर रहे हैं, कई पर्यटन स्थलों के समय में परिवर्तन करना पड़ा है तथा हवाई और रेल सेवाओं की परिचालन लागत बढ़ गई है। इसका प्रभाव होटल, रेस्तराँ और स्थानीय व्यापारियों की आय पर भी पड़ रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि जलवायु से जुड़ी एक घटना पूरे आर्थिक तंत्र को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।
कृषि क्षेत्र भी सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। बढ़ते तापमान और लंबे सूखे के कारण फसल उत्पादन घटता है, सिंचाई की लागत बढ़ती है और पशुधन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
हीना भाटिया कहती हैं कि परिणामस्वरूप खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि होती है, महँगाई बढ़ती है और आम उपभोक्ता की क्रय शक्ति प्रभावित होती है। दूसरी ओर सरकारों को स्वास्थ्य सेवाओं, आपदा प्रबंधन, राहत कार्यों और जलवायु-अनुकूल अवसंरचना पर अधिक संसाधन खर्च करने पड़ते हैं।
अर्थशास्त्र का एक मूल सिद्धांत है कि संसाधन सीमित होते हैं और प्रत्येक निर्णय की एक अवसर लागत (Opportunity Cost) होती है। आपदा राहत पर खर्च किया गया प्रत्येक अतिरिक्त रुपया वह संसाधन है, जिसे शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना या तकनीकी नवाचार पर लगाया जा सकता था। इसलिए जलवायु परिवर्तन सरकारों के सामने विकास और आपदा प्रबंधन के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को लगातार बढ़ा रहा है।
हीना भाटिया कहती हैं कि भारत भी इस चुनौती से अछूता नहीं है। हरियाणा, विशेषकर सिरसा सहित उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में हर वर्ष हीटवेव की तीव्रता बढ़ रही है। बढ़ता तापमान कृषि उत्पादन, बिजली की बढ़ती मांग, जल संकट तथा श्रमिकों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर रहा है। ऊर्जा की बढ़ती खपत से लागत बढ़ती है, सिंचाई पर अधिक खर्च आता है और किसानों की आय पर दबाव पड़ता है। साथ ही अत्यधिक गर्मी के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, जिसका प्रभाव सरकारी व्यय पर भी दिखाई देता है।
हीना भाटिया कहती हैं कि यूरोप की हीटवेव भारत के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है। यदि आज नवीकरणीय ऊर्जा जल संरक्षण, हरित अवसंरचना, वृक्षारोपण और प्रभावी हीट एक्शन प्लान में पर्याप्त निवेश नहीं किया गया, तो भविष्य में इसकी आर्थिक कीमत कहीं अधिक चुकानी पड़ सकती है। जलवायु परिवर्तन से निपटना केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का भी प्रश्न है।
आज जलवायु जोखिम वास्तव में वित्तीय जोखिम का रूप ले चुका है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, खाद्य महँगाई, बीमा दावों में वृद्धि और ऊर्जा की बढ़ती मांग विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है। ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा, सतत शहरी नियोजन, प्रभावी सार्वजनिक परिवहन और समय पर चेतावनी प्रणाली में किया गया निवेश भविष्य की आर्थिक सुरक्षा में किया गया निवेश माना जाना चाहिए।
हीना भाटिया कहती हैं कि आर्थिक दृष्टि से हीटवेव के पाँच प्रमुख प्रभाव, कृषि उत्पादन में कमी
, श्रमिकों की उत्पादकता में गिरावट,बिजली की बढ़ती मांग और ऊर्जा लागत में वृद्धि, खाद्य महँगाई में बढ़ोतरी, सरकारी व्यय और वित्तीय दबाव में वृद्धि है।
हीना भाटिया कहती हैं कि यूरोप की हीटवेव केवल यूरोप की समस्या नहीं है, बल्कि भारत सहित पूरे विश्व के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि आज भी जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण का विषय मानकर अनदेखा किया गया, तो आने वाले वर्षों में इसकी सबसे बड़ी कीमत अर्थव्यवस्था, कृषि, उद्योग, रोजगार और भावी पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी। इसलिए जलवायु परिवर्तन से प्रभावी ढंग से निपटना केवल पर्यावरण संरक्षण का अभियान नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित रखने की अनिवार्य आवश्यकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *