भक्ति की शक्ति या शक्ति की भक्ति? परंपरा और साधना के संवाहक हैं शक्ति प्रसाद सेमवाल

 

तिलक चंद रमोला नौगांव उत्तरकाशी : रवांई लोकांचल की समृद्ध देवपरंपरा, लोक आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही गणत विद्या आज भी कई परिवारों में जीवंत है। इसी परंपरा को श्रद्धा और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाने वाले व्यक्तित्व हैं सरनोल गांव निवासी शक्ति प्रसाद सेमवाल। उनके व्यक्तित्व और साधना को देखते हुए सहज ही प्रश्न उठता है कि इसे ‘भक्ति की शक्ति’ कहें या ‘शक्ति की भक्ति’। शायद दोनों ही अभिव्यक्तियां उनके जीवन पर समान रूप से सार्थक बैठती हैं।

माँ रेणुका के दिव्य धाम से सुशोभित और पांच पांडव देवताओं की देव परंपरा से दैदीप्यमान रवांई क्षेत्र का सुदूरवर्ती सरनोल गांव अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। इसी पावन परिवेश में माँ रेणुका के प्रतिष्ठित पुजारी परिवार में शक्ति प्रसाद सेमवाल का जन्म हुआ। बचपन से ही उन्होंने ऐसे वातावरण में आंखें खोलीं, जहां देव आस्था, पूजा-पद्धति और गणत विद्या जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।

अध्यापक दिनेश रावत बताते है कि उनके पास कोई व्यक्ति अपने घर से एक मुट्ठी चावल लेकर पहुंचता है तो वे अपनी पारंपरिक विद्या के साधन स्यांरू-पासू के माध्यम से उस चावल को देखकर उसके जीवन से जुड़ी अनेक बातों का आकलन करते हैं। इसी पारंपरिक ज्ञान और अनुभव के कारण दूर-दूर से लोग अपनी जिज्ञासाओं और जीवन की उलझनों को लेकर उनके पास पहुंचते हैं।

वर्तमान में श्री सेमवाल सरनोल, पुरोला और देहरादून तीनों स्थानों से आत्मीय रूप से जुड़े हैं। देहरादून के ऋषि विहार स्थित उनका निवास अब केवल आवास नहीं, बल्कि ज्योतिष एवं गणत विद्या में रुचि रखने वाले लोगों के लिए एक आध्यात्मिक एवं ज्योतिषीय केंद्र के रूप में पहचान बना चुका है। उन्होंने अपने केंद्र का नाम भी अपनी आराध्य देवी के नाम पर ‘रेणुका ज्योतिष केंद्र’ रखा है।

इस केंद्र की खासियत परंपरा और आधुनिकता का सुंदर समन्वय है। जहां ज्योतिषीय गणना एवं विश्लेषण के लिए आधुनिक कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर का उपयोग होता है, वहीं दूसरी ओर उनके पूर्वजों से चली आ रही गणत विद्या के पारंपरिक साधन स्यांरू, पासू और पातरू/पातड़ू आज भी सुरक्षित हैं।

श्री सेमवाल बताते हैं कि ये साधन उनके पूर्वजों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हुई अनमोल धरोहर हैं। उनके पूज्य पिता ने जीवन के अंतिम समय में यह विरासत उन्हें सौंपते हुए जनकल्याण के लिए इसका उपयोग करने का वचन लिया था। पिता से मिला यह वचन आज उनके लिए केवल स्मृति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है, जिसका वे निरंतर निर्वहन कर रहे हैं।

उनके पास आने वाले लोग केवल भविष्य जानने की जिज्ञासा लेकर नहीं आते। कोई पारिवारिक चिंता से परेशान होता है, कोई आर्थिक परिस्थितियों को लेकर चिंतित रहता है तो कोई नौकरी, व्यवसाय अथवा जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव को समझना चाहता है। ऐसे लोगों की बातें वे धैर्यपूर्वक सुनते हैं और अपनी विद्या व अनुभव के आधार पर उन्हें मार्गदर्शन देने का प्रयास करते हैं।

श्री सेमवाल की विशेषता केवल ज्योतिष और गणत विद्या का ज्ञान ही नहीं, बल्कि उनका सहज, सरल और आत्मीय व्यक्तित्व भी है। आधुनिकता की तेज दौड़ में जब अनेक पारंपरिक विधाएं, लोकज्ञान और पीढ़ियों से संचित अनुभव धीरे-धीरे विस्मृति की ओर जा रहे हैं, ऐसे समय में अपनी पैतृक विद्या को सहेजकर रखना और उसे आधुनिक साधनों के साथ आगे बढ़ाना निश्चित रूप से सराहनीय है। श्री सेमवाल इसी परंपरा के सजग संवाहक हैं।

उनसे मेरा संबंध भी किसी औपचारिक परिचय तक सीमित नहीं है। उनके प्रति स्नेह, सम्मान और श्रद्धा उनके आत्मीय व्यक्तित्व से उपजी है। जीवन की व्यस्तताओं के कारण मिलने-बैठने और संवाद का अवसर भले ही सहजता से न मिल पाए, लेकिन जब संबंध आत्मीय हों और मन में आस्था हो तो मिलन का अवसर देर-सवेर निकल ही आता है।

दिनेश रावत बताते है की अभी हाल ही में उन्होने अपने परिवार संग उनसे मुलाकात कर

अपनी कुशलक्षेम जानी, कहते है

आज भी आवश्यकता है कि हमारी लोकपरंपराओं, देव संस्कृति और पीढ़ियों से संचित पारंपरिक ज्ञान को केवल अतीत की विरासत मानकर न छोड़ा जाए, बल्कि उसे सम्मानपूर्वक संरक्षित किया जाए।

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