सत्ता का अहंकार और परिवारवाद लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा: मंत्री राजेश नागर  

 

प्रीति कंबोज/ रमोला न्यूज़

 चंडीगढ़:

25 जून, 1975 को लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर आपातकाल लागू कर संविधान की आत्मा की कर दी गई थी हत्या

*आपातकाल केवल सत्ता में बने रहने की निजी महत्वाकांक्षा*

संविधान हत्या दिवस हमें याद दिलाता है कि सत्ता का अहंकार और परिवारवाद लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। संविधान का पालन व रक्षा करना हम सबका परम कर्तव्य है। संविधान के खिलाफ या उसके मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाले कृत्यों को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। आज हम उन सभी वीरों को नमन करते है, जिन्होंने उस समय तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाई, जेल गए, यातनाएं सहीं, लेकिन झुके नहीं।

*आपातकाल में लोगों को जेलों में डाला गया और दी गई अनेक यातनाएं

देश आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर ‘संविधान हत्या दिवस‘ मना रहा है। 50 वर्ष पहले 25 जून, 1975 को हमारी लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर आपातकाल लागू कर संविधान की आत्मा की हत्या कर दी गई थी। इसके लिए आंतरिक संकट का हवाला दिया गया, जो दरअसल सत्ता में बने रहने की निजी महत्वाकांक्षा थी। उसके 21 मास बाद तक पूरा देश तानाशाही के चंगुल में रहा। एक मजबूत लोकतंत्र की कल्पना करने वाले लोगों को अपनी महत्वकांक्षा पूरी करने के लिए जेलों में डाल गया और अनेक यातनाएं दी गई। आज संविधान हत्या दिवस मनाने का उद्देश्य देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बारे में आमजन, विशेषकर नई पीढ़ी को निरंतर सजग बनाये रखना है।

*कुछ लोग सविधान की किताब को हाथ में लेकर संविधान बचाने का कर रहे पाखंड*

कुछ लोग संविधान की किताब लेकर जगह-जगह घूम रहे हैं और संविधान बचाओ का पाखंड कर रहे हैं। वे ही लोग बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के लिखे संविधान को खतरे में बता रहे हैं। एक समय था, जब उन्हीं की पार्टी ने रात के अंधेरे में सरेआम संविधान की हत्या कर दी थी। जिन लोगों के राजनैतिक पूर्वजों ने देश पर तानाशाही थोपी, प्रेस का गला घोंटा, नेताओं को जेलों में डाला, जबरन नसबंदी का कहर भरपाया, वे आज किस मुंह से संविधान और लोकतंत्र के रक्षक होने की दुहाई दे रहे हैं। उन्हें लोकतंत्र पर भाषण झाड़ने से पहले लोकतंत्र की हत्या के पाप को स्वीकार करना चाहिए और देश से माफी मांगनी चाहिए।

*उनका ‘संविधान बचाओ‘ का नारा केवल राजनैतिक अवसरवादिता और सत्ता की भूख का प्रतीक*

कांग्रेस के नेताओं का ‘संविधान बचाओ‘ का नारा केवल राजनैतिक अवसरवादिता और सत्ता की भूख का प्रतीक है। जबकि वर्तमान सरकार प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में संविधान को सर्वोपरि मानकर ‘सबका साथ-सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास‘ की लोकतांत्रिक भावना पर चल रही है। हमारी सरकार का हर कदम संविधान को मजबूत करने वाला है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा है कि हम अपने लोकतांत्रिक आदर्शों और संविधान को सर्वोपरि मानते हैं।

*कांग्रेस ने 90 से अधिक बार धारा-356 का दुरुपयोग कर राज्य सरकारों को किया बर्खास्त*

जिस पार्टी ने उस समय लोकतंत्र को कुचला, वही आज फिर से संविधान की दुहाई देकर समाज में भ्रम फैलाने का प्रयास कर रही है। वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने दावा किया था कि यदि भाजपा सत्ता में लौटती है, तो वह संविधान को खत्म कर देगी। संविधान और लोकतंत्र को बार-बार अपमानित करने की उनकी समझ को देश की जनता ने करारा जवाब दिया। देश में लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को जनादेश दिया। कांग्रेस का इतिहास इस बात का गवाह है कि उसने धारा-370 जैसी विभाजनकारी व्यवस्था को बनाए रखा, 90 से अधिक बार धारा-356 का दुरुपयोग कर राज्य सरकारों को बर्खास्त किया और 75 बार से भी अधिक संविधान में संशोधन कर अपने राजनीतिक हितों को साधने का काम किया। उनके लिए संविधान कोई आदर्श नहीं, बल्कि एक राजनीतिक औजार रहा है। जब भी उन्हें अपनी सत्ता को चुनौती महसूस हुई, उन्होंने संविधान के मूल्यों को बलिदान कर दिया।

*प्रधानमंत्री ने देश की एकता, अखंडता को मजबूत करने से लेकर देश की सुरक्षा के उठाए ऐतिहासिक कदम*

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने देश की एकता, अखंडता को मजबूत करने से लेकर दुश्मनों से देश की सुरक्षा करने के ऐतिहासिक उदाहरण जनता को दिए हैं। जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के ‘एक राष्ट्र-एक विधान‘ के सपने को साकार करने की बात हो या ‘आप्रेशन सिंदूर‘ के माध्यम से पाकिस्तान की धरती पर आतंकवाद व आतंकवादियों को मिट्टी में मिलाना सुनिश्चित करना, पूरी दुनिया इसका लोहा मान रही है।

देश आपातकाल में कांग्रेस द्वारा किए गए अन्याय और अत्याचार को कभी भूल नहीं पाएगा। यह दिवस हमें यह भी स्मरण कराता है कि जब सत्ता तानाशाही बन जाती है, तो जनता उसे उखाड़ फेंकने की भी ताकत रखती है।

आपातकाल कोई राष्ट्रीय आवश्यकता नहीं, बल्कि कांग्रेस और सत्ता के मद में चूर एक व्यक्ति की लोकतंत्रविरोधी मानसिकता का परिचायक था। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ प्रेस की स्वतंत्रता छीन ली गई, न्यायपालिका को मूक दर्शक बना दिया गया और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया।

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