जसपाल सिंह/रमोला न्यूज/01 जुलाई
देहरादून- उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो गया है, अब राज्य के सभी पंजीकृत मदरसों में स्कूली पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा, जहाँ नई व्यवस्था के अनुरूप मदरसों को ढालने के लिए सरकार नें कमर कस ली है, वहीं अधिकांश मदरसे धाकड़ धामी सरकार के इस फैसले के साथ देश की भावी पीढ़ियों को कल का भविष्य बनानें के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करने में जुट गए हैं।
उत्तराखंड में 1 जुलाई 2026 से मदरसा शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है, सरकारी आदेश के अनुसार, 30 जून 2026 को उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो गया, अब से राज्य के सभी मदरसों की निगरानी, मान्यता, पाठ्यक्रम और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की कमान राज्य अल्पसंख्यक शिक्षण प्राधिकरण के हाथों में सौंप दी गई है।
मदरसों के मूल स्वरूप को बदलनें वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है, सरकार का साफ संदेश है कि अब मदरसों को केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं रखा जा सकता, उन्हें मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ना ही होगा, ताकि राज्य का हर एक बच्चा देश की संस्कृति, परंपरा, प्रकृति, पर्यावरण, प्रेम, बंधु-बंधुत्व, शिक्षा, संस्कार, इतिहास से राष्ट्र निर्माण की ओर बढ़ सके, सरकार देश के युवा भविष्य को और उनकी ताकत को राष्ट्र निर्माण व विकास के लिए तैयार करना चाहती है।
बतादें कि उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव हुआ है, शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी नए बने ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ यानी यूसेम के पास होगी, 1 जुलाई 2026 से उत्तराखंड मदरसा शिक्षा परिषद का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा जिसमें 452 पंजीकृत मदरसे अब यूसेम के दायरे में आएंगे, अब सिर्फ मदरसे नहीं सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के स्कूल भी यूसेम देखेगा, इसके पीछे का मकसद शिक्षा में एकरूपता और गुणवत्ता के साथ बिना भेदभाव के राष्ट्र प्रेम बंधु बंधुत्व वाली समान शिक्षा है।
साथ ही सभी मदरसों को अब उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी, सिलेबस में अंग्रेजी, विज्ञान, गणित, कंप्यूटर जैसे आधुनिक विषय अनिवार्य होंगे, बंद और विवादित 30 मदरसों के लिए रिसीवर नियुक्त होंगे, भूमि रिकॉर्ड, वित्तीय स्थिति, स्टाफ योग्यता सबकी जांच होगी नियम तोड़ेने पर मान्यता रद्द भी हो सकती है।
