पैदल यात्रा पर निकले संतों नें सरकार के सरल, सुव्यवस्थित, सुरक्षित यात्रा की खोली पोल

जसपाल सिंह/रमोला न्यूज
देहरादून- अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर प्रदेश में चल रही चारधाम यात्रा जोर शोरों पर है, बेशक यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी तय होगा, लेकिन यात्रियों के सीमितिकरण पर कोई पाबंदी नहीं है, होटलों, रेष्ट्रां, होम स्टे, बाजारों में भीड़ जोर शोर से चल रही यात्रा का प्रत्यक्ष आईना है, शासन-प्रशासन जहाँ प्रदेश में चल रही यात्रा को सुव्यवस्थित एवं सुरक्षित रूप से संचालित करनें की बात करता नजर आ रहा है, वहीं प्रदेश के अधिकांश पौराणिक पैदल मार्ग शासन-प्रशासन के चारधाम यात्रा की पोल खोलते नजर आ रहे हैं।

चारधाम तीर्थाटन पर लगजरी गाड़ियों, ट्रेब्ल्स कंपनियों की छोटी-बड़ी चार पहिया वाहनों में यात्रा कर रहे आर्थिक रूप से सक्षम गृहस्थ प्रयटकों, संत महात्माओं, तीर्थ यात्रियों को सुव्यवस्थित सुरक्षित करानें का श्रेय शासन-प्रशासन लेता नजर आ रहा है, लेकिन विरान जंगलों से निकलनें वाले संत-सन्यासियों की पैदलयात्रा पर शासन प्रशासन और क्षेत्रीय जन-प्रतिनिधि मौन बैठे हैं, आधुनिकता की दौड़ में विलुप्त होती पुरानी परम्पराओं, संस्कृति, संस्कारों, रीति-रिवाजों पुरानें बाटे-घाटों को सरल, सुदृढ़ जिंदा नहीं बल्कि कमजोर किया जा रहा है, पैदल यात्रियों की यात्रा सिर्फ राम और हनुमान भरोसे चल रही है, क्या लगजरी गाड़ियों में होंनें वाली यात्रा को सुव्यवस्थित सुरक्षित यात्रा कराना शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है, आखिर कब और कौन बना पायेगा विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा का सही, सरल, सुरक्षित और सुव्यवस्थित रोड़मैप।

बताते चलते हैं कि यमुनोत्री गंगनानी से घनघोर जंगलों के बीच चीड़, बाँझ, बुरांश, जंगली जानवरो और आँधी तूफान झेलते हुए नंदगाँव, सिंगोट, फलारचा, नाकुरी पैदलयात्रा लगभग 18 से 20 किमी. राष्ट्रीय राजमार्ग नाकुरी पहुँचती है, लेकिन जंगलों से पैदल आ रहे संत सन्यासी लोक निर्माण विभाग द्वारा पैदल मार्ग को दर्शानें वाले दिशा चिन्हों की कमी से रास्ता भटक रहे हैं, इस तरह की लापरवाही शासन प्रशासन और विभाग की चारधाम यात्रा की पोल खोलती नजर आती हैं, इस तरह की घोर लापरवाही पैदल पगडंडी पद-यात्रियों के रजिस्ट्रेशन और सुरक्षित, सुव्यवस्थित यात्रा पर सवालीय निशान है।

पैदल पगडंडियों में राहगीरों के लिए बनें पुरानें आश्रय, धर्मशाले व मँदिर, सामाजिक कार्यकर्ताओं, समाज चिंतकों, जन-प्रतिनिधियों और शासन-प्रशासन की घोर लापरवाही से विरान पड़े हैं, क्या सरकार जोर शोर से चल रही प्रदेश की पैदल चारधाम यात्रा का संज्ञान लेगी या लगजरी गाड़ियों चार पहिया वाहनों की यात्रा को सुव्यवस्थित सुरक्षित बनाकर ही वाह वाही लूटेगी, पैदल पद यात्रियों के लिए प्रदेश के विभिन्न जिलों के जिलाधिकारी पैदल रूटों पर लोक निर्माण विभागों को दिशा चिन्ह लगानें और सरकारी आश्रयों, धर्मशालाओं आदि के संज्ञान के लिए दिशा निर्देश देंगे यह क्षेत्रीय लोगों, जन-प्रतिनिधि और विभागीय सर्वे से ही पता लगेगा।

प्रशासन जहाँ यात्रा मार्गों से लेकर चारधामों तक सभी आवश्यक व्यवस्थाएं चाक-चौबंद करनें चारों धामों में श्रद्धालु बड़ी संख्या में सुरक्षित एवं सहज रूप से दर्शन करनें की बात करते सुना जा रहा है, प्रशासन द्वारा यात्रा मार्गों पर यातायात प्रबंधन, स्वास्थ्य सुविधाएं, पेयजल, विद्युत व्यवस्था, पार्किंग तथा सुरक्षा प्रबंधों को प्रभावी ढंग से संचालित करनें की बातों पर जोर दिया जा रहा है, वहीं पैदल पद यात्रियों को नजर अंदाज कर जंगलों में स्वास्थ्य, सुरक्षा, विद्युत व्यवस्था, रैन बसेरे, विरान पड़े धर्मशाले पैदल पद यात्रियों को चिढ़ा रहे हैं, यात्रा से जुड़े विभिन्न विभागों की टीमें लगातार जहाँ चार पहिया यात्रियों को आवश्यक सुविधाएं सहायता उपलब्ध करा रही हैं।

वहीं प्रदेश की चारधाम यात्रा में अलग अलग राज्यों से पहुँचे अधिकांश पैदल पदयात्री जो ऋषिकेश से 2 तारीख को चारधाम के लिए अपने पहले अनुभव के साथ तो कुछ संत महात्माओं के पास दूसरी तीसरी बार का तजुर्बा साथ था, इन संतों के पास शहर से लेकर बाजार और वीरान जंगलों का खौफनाख कष्टदाई एहसास था, शरीर पर घाव पहाड़ से उतरनें के बाद चीड़, बाँझ, बुरांश के पत्तों से लुढ़कनें फिसलनें की पीड़ा सरकार के नेतृत्व और सरल, सुरक्षित, सुव्यवस्थित यात्रा की पोल खोलते नजर आ रही है।

पैदल यात्रा पर निकले संतों नें सरकार के सरल, सुव्यवस्थित, सुरक्षित यात्रा की पोल खोली, संतों नें कहा कि पैदल यात्रियों की यात्रा के लिए सरकार प्रशासन जबाबदेह नहीं है, चारधाम के लिए निकले पैदल पदयात्रियों में जहाँ दो मूर्ति स्वामी मोक्षानंद महाराज, स्वामी सुधासागर ऋषिकेश उत्तराखंड से ही थे तो वहीं तीन मूर्तियाँ स्वामी शिवानंद महाराज, स्वामी कृष्णानंद महाराज अमरकंटक संत देवेंद्र दास मुरैना एमपी से पैदल चारधाम यात्रा के लिए निकले थे, इस तरह की मुश्किल भरी पैदलयात्रा करनें वाले संत-सन्यासियों की भी शासन-प्रशासन को सुध लेनी चाहिए, ताकि प्रदेश की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा और शासन-प्रशासन की वाहवाही हो, और यात्रियों की संख्या में हर साल बढ़ोतरी हो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *