ऐ महंगाई

*ऐ महंगाई*

कमर तोड़ दी गरीब की,ऐ महंगाई तू क्यों आई,

हर तरफ उदासी है छाई,ऐ महंगाई तू क्यों आई।

मंहगा हो गया आटा,नमक, सब्जी हो या दाल,

बजट सबका लड़खड़ा गया है,बदल गई है चाल।

मजदूर, किसान हो या कर्मचारी चाहे छात्र हो या व्यापारी

हो गया है सबका बुरा हाल,

महँगाई की मार से बचा नहीं है बुढ़ा हो या नौनिहाल।

निवाला छीन लिया है गरीब का, ऐ महंगाई तू क्यों आई,

जिंदगी जीने में आ रही है कठिनाई, ऐ महंगाई तू क्यों आई।

पेट्रोल,डीजल या रसोई गैस हुआ है हर ईंधन महंगा,

जूता,कपड़ा, सूट, सलवार या हो चुन्नी लहगां।

महंगाई की मार से बचा नहीं है कोई फटेहाल हो या चंगा,

बाजार से कोई सामान खरीद लो,बह रही है महंगाई की गंगा।

जिंदगी निचोड़ दी गरीब की,ऐ महंगाई तू क्यों आई,

तुझे जरा सी शर्म नहीं आई, ऐ महंगाई तू क्यों आई।

मकान बनाना आसान नहीं है, सुन ले मेरे मित्र,

महंगी हो गई सीमेंट,बजरी,सरिया हो या पत्थर।

आसमान छू रहे हैं प्लॉट के भाव,कम नहीं है फर्नीचर।

लकड़ी महंगी बहुत हो गई शीशम, शाल हो या कीकर।

सपने तोड़ दिए गरीब के , ऐ महंगाई तू क्यों आई,

गरीब की आंखे है भर आई, ऐ महंगाई तू क्यों आई।

किताबे महंगी हो गई है ,रोज बढ़ रही है फीस,

पढ़ना लिखना हुआ है महंगा, निकल रही है गरीब की टीस।

सफ़र करना हुआ है मुश्किल बढ़ रहा है रोज किराया,

*सिहाग* कहे भुगतना पड़ेगा बचने का नहीं है कोई उपाय।

गला घुट रहा है गरीब का जब से ये डायन महंगाई है आई ,

चारों ओर है अंधेरा कहीं नहीं रोशनी नजर आई, ऐ महंगाई तू क्यों आई ।

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