रमोला न्यूज/ अनिल चन्द रमोला
टिहरी गढ़वाल
दुनिया कितनी बेढंगी, मगरूर और स्वार्थी है कितनी जल्दी सब कुछ भूल जाती है।
पहाड़ की महान शख्सियत और दानवीर जो आज से 40 साल पहले जंगल जंगल चाल खाल बनवाते थे, जंगली जानवरों के लिए जंगलों में हजारों किलो सेंदा नामक के बड़े बड़े टुकड़े रखवाते थे नदी नदी मछली तालाब बनवाते थे। शराब को पहाड़ से खत्म करने के लिए सेवा समिति ( वर्दीधारी फोर्स) बनाते थे , अनसूचित जाति और गरीबों की आर्थिक मदद करना तो मानो उनके जन्म का असली मकसद था । गढ़वाल और कुमाऊँ के सैकड़ों स्कूलों को भवन बनाने के लिए पैसे दान दिया करते थे। अच्छा पढ़ने वाले हर बच्चे को आर्थिक मदद के साथ साथ ड्रेस , खेल में भी मदद करते थे और मेधावी बच्चों को तो हेलीकॉप्टर की सैर तक करवाते थे ।
पूरे देश मे गढ़वालियों का नाम वीरचंद्र सिंह गढ़वाली के बाद किसी ने सबसे अधिक ऊंचा किया तो इसी महान स्वाभिमानी गढ़वाली ने किया। किसी जमाने मे फतेहपुरी दिल्ली में 4×4 फिट की गढ़वाल पनीर भंडार नाम की दुकान जिसका विज्ञापन 1980 के दशक में भारत के एक मात्र सबसे चर्चित रेडियो चैनल विविध भारती पर प्रसारित होता था । #जम्बूरे बतायेगा #गढ़वाल #पनीर #भंडार#……….. ठाकुर वीर सिंह कंडारी की इसी गढ़वाल पनीर भंडार की डेयरी में 1000 से अधिक गढ़वाली, कुमाउँनी लोग काम करते थे । आज उसी गढ़वाल पनीर भंडार के नाम पर दिल्ली में सैकड़ों फर्जी गढ़वाल पनीर भंडार खुले है। एक और रोचक बात शायद जंहा तक मेरी जानकारी है गढ़वाल के ये ऐसे पहले व्यक्ति रंहे होंगे जो पहलवान भी रंहे जिन्होंने कई कुश्तियां भी लड़ी यानि अखाड़े में भी अपना जौहर दिखाया।
यही नही उत्तराखंड के सबसे बड़े राजनेता जिन्होंने इंदिरा गांधी तक को हिला दिया था स्वर्गीय हेमवतीनंदन बहुगुणा भी इस महान समाजसेवी और दानवीर को बहुत सम्मान देते थे और उनको गढ़वाल का महान दानवीर बोलते थे। कभी न झुकने वाला यह गढ़वाली पूरे जीवन भर गरीबों, पिछड़ों, मजलूमों के लिए अपनी करोड़ो की कमाई खर्च करता रहा । अपने लिए न कोई संम्पत्ति बटोरी ना अपने परिवार को कभी तरजीह दी अपने जीवन के अंतिम समय मे बहुत ही ख़ामोसी कि जिंदगी जी एक फूटी कौड़ी भी अपने लिये नही रखी थी ।
इनका बचपन का जीवन कितनी गरीबी में गुजरा होगा बचपन मे पशु (गोरु )चराने जंगल में गए थे और जंगल मे बाघ ने गाय का बछड़ा मार दिया और बस पिता की मार की डर से इतने डर गये कि 11 साल की उम्र में जंगल से भाग गए (देश तब अंग्रेजो का गुलाम था) और भटकते भटकते लाहौर पहुंच गए और फिर विभाजन के बाद वापस दिल्ली आए यंही से अपना व्यापार शुरू किया और फिर कुछ ही समय मे दूध और पनीर के वन गए बड़े व्यवसाई और फिर फिर जुट गए अपने पहाड़ के सेवा में ।
पर कमबख्त दुनिया इनको क्यों याद करेगी ?
क्योंकि इन्होंने दौलत का इस्तेमाल अपने लिए नही किया?
इन्होंने जीव जंतु और पर्यावरण की चिंता की ?
इन्होंने बड़े, शहरों में अपने लिए संपत्तियां नही बटोरी ?
इन्होंने पैसे का दिखावा नही किया ?
अपने बेटे की शादी में शराब नही परोसी और बेटे की शादी में सिर्फ़ सगुन के तौर पर एक रुपय का दहेज लिया ?
दुनिया आज उसको बड़ा मानती है जो अपने लिए दौलत कमाता है सैकड़ो गाड़िया, दुकान, मकान राजनीति में रुतवा हो
मै इनके जीवन के बारे में बहुत कुछ तो नही जनता लेकिन जो भी जनता हूँ उसका कुछ ही हिस्सा लिख पाया हूँ । क्योंकि समय समय मुझे याद आतें है।
क्या आप भी इस महान स्वर्गीय आत्मा और गढ़वाल के दानवीर को जानतें है ? अगर जानते है तो फिर बताइये कौन थे ये जरूर कुछ इनके बारे में लिखकर बताइये यही इनको सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी ।
शत शत नमन…
