परिसीमन और महिला आरक्षण: बदलता लोकतांत्रिक संतुलन….

 

सुरेंद्र चंद रमोला / रमोला न्यूज़

चिन्यालीसौड़: वर्तमान में भारत में बहुचर्चित विषय प्रस्तावित परिसीमन और लोकसभा सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर लगभग दोगुना करने का विचार केवल एक प्रशासनिक या संख्यात्मक बदलाव नहीं है, बल्कि यह देश की लोकतांत्रिक संरचना, संघीय संतुलन और सामाजिक प्रतिनिधित्व को गहराई से प्रभावित करने वाला विषय है। जब इस प्रक्रिया को नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के संदर्भ में देखा जाता है, तो यह जितना महत्व पूर्ण है उतना ही जटिल भी हो जाता है दरअसल, महिला आरक्षण कानून का वास्तविक क्रियान्वयन नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही संभव होगा, जिससे ये दोनों प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ जाती हैं।
महिला आरक्षण कानून के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी हैं। यदि लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग दोगुनी कर दी जाती है, तो स्वाभाविक रूप से महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ेगी। यह भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को एक नए स्तर पर ले जाने का अवसर प्रदान कर सकता है। लंबे समय से राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सीमित रहा है, और यह पहल उन्हें न केवल अधिक संख्या में संसद तक पहुंचने का अवसर देगी, बल्कि नीति निर्माण में उनकी सक्रिय भागीदारी को भी सुनिश्चित कर सकती है। इससे सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता को भी मजबूती मिल सकती है।
हालांकि, इस संभावित परिवर्तन के साथ कई महत्वपूर्ण चुनौतियाँ और चिंताएँ भी सामने आती हैं। सबसे प्रमुख मुद्दा क्षेत्रीय असंतुलन का है। परिसीमन का आधार जनसंख्या होता है, और वर्तमान परिदृश्य में उत्तर भारत के राज्यों की जनसंख्या दक्षिण भारत की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ी है। यदि सीटों का पुनर्विन्यास इसी आधार पर किया जाता है, तो उत्तर भारत के राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों को अपेक्षाकृत कम लाभ मिलेगा। यह स्थिति उन राज्यों के लिए असंतोष का कारण बन सकती है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। साथ ही दक्षिण भारतीय राज्य महिला साक्षरता, प्रतिव्यक्ति आय, आदि कई मूल्यों में उत्तर से आगे रहे हैं इससे यह धारणा भी बन सकती है कि जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के बजाय अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को राजनीतिक रूप से लाभ मिल रहा है। दक्षिण यह दंड जैसा लगेगा
राजनीतिक दृष्टिकोण से भी यह बदलाव दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ने से बड़े राज्यों का प्रभाव केंद्र की राजनीति में और अधिक मजबूत हो जाएगा। इसके साथ ही, महिला आरक्षण लागू होने से राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चयन में नए सामाजिक और लैंगिक समीकरणों को ध्यान में रखना होगा। इससे एक ओर राजनीति में नए नेतृत्व और नए सामाजिक वर्गों का उदय हो सकता है, वहीं दूसरी ओर जाति, वर्ग और लिंग के आधार पर नए प्रकार की प्रतिस्पर्धा और ध्रुवीकरण भी देखने को मिल सकता है।
केवल सीटों की संख्या बढ़ा देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि संसद की गुणवत्ता और कार्यक्षमता बनी रहे।
इसके अतिरिक्त, महिला आरक्षण के तहत सीटों के निर्धारण और रोटेशन की प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाना भी अत्यंत आवश्यक है। यदि यह प्रक्रिया स्पष्ट और संतुलित नहीं होगी, तो यह आशंका बनी रहेगी कि आरक्षण केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाएगा। वास्तविक सशक्तिकरण तभी संभव है जब महिलाओं को स्थायी और प्रभावी राजनीतिक अवसर मिलें, न कि केवल औपचारिक प्रतिनिधित्व।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक प्रतिनिधित्व का भी है। महिला आरक्षण के भीतर विभिन्न वर्गों—जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग—की महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना भी एक जटिल चुनौती होगी। यदि इस संतुलन को सही ढंग से नहीं साधा गया, तो यह नई असमानताओं को जन्म दे सकता है।
अंततः, परिसीमन और महिला आरक्षण का यह संयुक्त प्रभाव भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ा अवसर भी है और एक गंभीर परीक्षा भी। यह देश को अधिक समावेशी, प्रतिनिधिक और आधुनिक लोकतंत्र की ओर ले जा सकता है, बशर्ते इसे संतुलन, सहमति और दूरदृष्टि के साथ लागू किया जाए। सभी राज्यों, क्षेत्रों और सामाजिक वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को और अधिक मजबूत कर सकती है। अन्यथा, यह सुधार अनजाने में क्षेत्रीय असंतोष, राजनीतिक असंतुलन और सामाजिक तनाव को भी जन्म दे सकता है।

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