सुरेश चंद रमोला
कोटधार/ उत्तरकाशी
96 वर्ष पहले जब जंगल बचाने दाहड उठा था रंवाल्टा समुदाय।
रवांल्टा समुदाय के विद्रोही कृषकों ने हिला दिए थे राज शाही के चूल्हे ।।
चिन्यालीसौड़ प्रखंड के दसगी क्षेत्र के कोटधार में तिलाडी कांड के उन अमर सहीदों श्रद्धाजंली दी गयी जिन्होंने तिलाडी के उस नर संहार में अपने प्राणों की आहुतियां दी थी । सहीदों में कामदा के भागरथू, हरीराम, बडली के गौरू, रामशरण, खदाडा के देव सिंह, तेग सिंह और बड़ेथी के नत्थी सिंह कश्यप उस राजशाही के अत्याचारों से तिलाडी के मैदान में अमर हो गये। कोटधार में स्थित शहीद स्मारक में क्षेत्र के लोगौ ने बड़ी संख्या में पहुंचकर उन यौद्धाओं को याद किया और उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किये।
उत्तराखंड के बड़कोट में 96 वर्ष पहले हुआ तिलाड़ी वन आंदोलन केवल जंगलों के अधिकारों की लड़ाई नहीं थी बल्कि यह हिमालयी समाज की अस्मिता, आजीविका और स्वाभिमान की ऐतिहासिक जंग थी।
30 मई 1930 उत्तराखंड के इतिहास (तत्कालीन टिहरी रियासत) का वह रक्तरंजित अध्याय है, जिसे ‘पहाड़ का जलियांवाला बाग’ कहा जाता है। जलियांवाला बाग की तरह ही इस नरसंहार में भी बड़कोट के निकट यमुना किनारे तिवाड़ी मैदान में निहत्थे ग्रामीणों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई गई।
इस क्रूर घटना को टिहरी रियासत के दीवान चक्रधर जुयाल द्वारा अंजाम दिया गया ।
यह घटना बताती है कि जब जनता के प्राकृतिक अधिकार छीने जाते हैं, तो प्रतिरोध की चिंगारी एक बड़े आंदोलन में बदल जाती है।
ब्रिटिश शासन के प्रभाव में टिहरी रियासत ने वर्ष 1929-30 में नई वन बंदोबस्त नीतियां लागू कीं। इन नीतियों का उद्देश्य जंगलों से अधिक राजस्व कमाना था, लेकिन इसका सबसे बड़ा असर रवांई-जौनपुर के ग्रामीणों पर पड़ा। सदियों से जंगलों पर निर्भर लोगों की चराई, जलाऊ लकड़ी, घास और खेती तक की पहुंच सीमित कर दी गई। ग्रामीणों पर नए-नए कर थोप दिए गए। हर चूल्हे पर “चूल्हा कर”, आलू उत्पादन पर कर, पशुओं पर “पुच्छी कर” और महिलाओं से घास लाने तक पर टैक्स वसूला जाने लगा।
इतना ही नहीं, झूम खेती, शिकार, मछली पकड़ने और शराब बनाने जैसी पारंपरिक गतिविधियों पर भी रोक लगा दी गई। लकड़ी लेने के लिए आवेदन प्रक्रिया और शुल्क अनिवार्य कर दिया गया। इन दमनकारी फैसलों ने ग्रामीणों की आजीविका को संकट में डाल दिया और जनता के भीतर भारी आक्रोश पैदा हो गया।
इसी विरोध से जन्म हुआ “आजाद पंचायत” का। यह पंचायत रवाई क्षेत्र के ग्रामीणों द्वारा संचालित समानांतर व्यवस्था थी, जिसने टिहरी रियासत के अधिकार को खुली चुनौती दी। पंचायत ने साफ कहा कि जंगलों पर पहला अधिकार उन लोगों का है, जो पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं। ग्रामीणों ने नई वन सीमाओं और कानूनों को मानने से इनकार कर दिया। रियासत ने आंदोलन दबाने के लिए मुकदमे चलाए, गिरफ्तारियां कीं और कई जगह गोलियां तक चलाईं, लेकिन इससे आंदोलन और तेज हो गया।
30 मई 1930 को तिलाड़ी मैदान में हजारों ग्रामीण शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्र हुए। सभा में बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और युवा बड़ी संख्या में शामिल थे। उनकी मांग थी कि अन्यायपूर्ण कर समाप्त किए जाएं, चराई के अधिकार बहाल हों, कुली-बेगार खत्म की जाए और जंगलों से जुड़े पारंपरिक अधिकार लौटाए जाएं।
लेकिन जनता की आवाज सुनने के बजाय रियासत के दीवान चक्रधर जुयाल और डीएफओ पद्म दत्त रतूड़ी ने दमन का रास्ता चुना। तिलाड़ी मैदान को तीन ओर से सेना ने घेर लिया, जबकि चौथी ओर यमुना नदी थी। अचानक गोलियों की बौछार शुरू हो गई। जान बचाने के लिए लोग भागे, कई ग्रामीण यमुना नदी में कूद पड़े और अनेक लोग गोलियों का शिकार हो गए। इस घटना में मृतकों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे हैं। सरकारी रिकॉर्ड में संख्या कम बताई गई, जबकि कई स्रोतों में सैकड़ों लोगों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है। गढ़वाली साप्ताहिक के अनुसार 600 से अधिक गोलियां चलाई गई थीं।
स्थानीय समाचार पत्र “गढ़वाली साप्ताहिक” ने इस आंदोलन और जनसंहार को जनता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। संपादक विश्वंभर दत्त चंदोला ने सेंसरशिप और जेल का सामना करने के बावजूद ग्रामीणों की आवाज बुलंद की। इसी वजह से तिलाड़ी आंदोलन पूरे उत्तराखंड में जनप्रतिरोध का प्रतीक बन गया।
लगातार विरोध और जनता के दबाव के आगे आखिरकार टिहरी रियासत को झुकना पड़ा। अक्टूबर 1930 में महाराजा नरेंद्र शाह ने कई कर समाप्त करने और जंगलों से लकड़ी व चारे के अधिकार बहाल करने की घोषणा की। यह रवाई-जौनपुर के लोगों की बड़ी जीत थी।
तिलाड़ी आंदोलन की गूंज बाद के पर्यावरण आंदोलनों, खासकर चिपको आंदोलन तक सुनाई दी। आज जब हिमालय जलवायु परिवर्तन, वन कटान और पर्यावरण संकट से जूझ रहा है, तब तिलाड़ी हमें याद दिलाता है कि प्रकृति की रक्षा तभी संभव है, जब स्थानीय समुदायों के अधिकारों और उनकी आवाज का सम्मान किया जाए। तिलाड़ी केवल इतिहास नहीं, बल्कि पर्यावरण न्याय और जनअधिकारों की जीवंत प्रेरणा है।
कोटधार में आयोजित शहीद दिवस में जिला पंचायत सदस्य सरीता वर्धन, जेष्ठ प्रमुख सुमित्रा देवी, प्रधान संगठन के अकवीर राणा क्षेत्र पंचायत सदस्य शैलेन्द्र लाल, प्रधान सीमा देवी, प्रियंका पंवार तिवाड़ी शहीद स्मारक के अध्यक्ष चिरंजी प्रसाद अवस्थी सचिव सोहन बटियाटा आदि अन्य कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे ।
