जसपाल सिंह/रमोला न्यूज
उत्तरकाशी-शहर में कूड़ा निस्तारण की गंभीर समस्या को लेकर पिछले 121 दिनों से चल रहे धरनें को आखिर बिना कुछ पाए कदम पीछे खीँचनें पड़ गए, जहाँ क्रांतिकारी गोपीनाथ रावत की 121 दिनों की तपस्या को बिना नगरवासियों के जन-समर्थन, राजनीति व रणनीतिकारों की कूटनीति नें भंग कर बहुत कुछ खोनें को मजबूर कर दिया वहीं मौन रहकर शहरवासियों नें भी बिन पाए सदियों के लिए बहुत कुछ खो दिया, क्योंकि जब जनता परेशान होगी और चाहेगी कि हमारी आवाज कोई बनें तो गोपीनाथ जैसे जज्बा कमजोर पड़ जायेगा, फिर कोई बड़ा नेता ही होगा जो अपनी राजनीति के लिए यह तय करेगा की किसे नेता और किसे अभिनेता बनाना है।
शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से चल रहे इस आंदोलन को जहाँ चार माह से उपर का समय लगा वहीं 121वें दिन अपनी मांगों को उठाने के बावजूद भी आज तक कूड़ा निस्तारण की स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी, विशेष रूप से ट्रेंचिंग ग्राउंड का निर्माण अब तक अधूरा है, जो नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आंदोलनकारियों नें इतनें लम्बें वक्त में न जानें प्रशासन और नगर पालिका को समस्या के समाधान के लिए कितनें कोरे कागजी पन्नों को दौड़ाया होगा, लेकिन जिम्मेदार विभागों की ओर से केवल आश्वासन ही मिलते रहे, जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली, इतनें बड़े शहर में खामोश, मौन, राजनीति का शिकार हुई जनता नें अकेले गोपीनाथ के आंदोलन को पीछे हटनें को मजबूर कर दिया, 121 दिनों तक समर्थन विश्वास की उम्मीद लगाए बैठे कुछ लोगों का आंदोलन थक हार इस महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया।
121वें दिन अकेले थक हार अपनें आंदोलित साथियों के साथ इस धरने का औपचारिक समापन किया गया, यह ऐतिहासिक आंदोलन चुप बैठी जनता, बहरे प्रशासन, नगरपालिका, दिग्गज छोटे बड़े नेताओं और गोपीनाथ रावत के लिए कई सवाल छोड़ गया, बेशक यह समापन किसी हार का प्रतीक न हो लेकिन यात्रा शुरू होंनें से ठीक एक दिन पहले इतने लम्बे ऐतिहासिक महाआंदोलन का अंत जन-समस्याओं के लिए उठती हुंकार जज्बे, जुनून को हमेशा के लिए दबाना है।
